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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 4

अध्याय 7 · श्लोक 4

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४॥

bhūmir āpo ’nalo vāyuḥ khaṃ mano buddhir eva ca | ahaṅkāra itīyaṃ me bhinnā prakṛtir aṣṭadhā ||4||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

भूमि: पृथ्वी; आपः: जल; अनलः: अग्नि; वायुः: वायु; खम्: आकाश; मनः: मन; बुद्धि: बुद्धि; एव: भी; च: और; अहंकार: अहंकार; इति: इस प्रकार; इयम्: यह; मे: मेरी; भिन्ना: पृथक; प्रकृतिः: प्रकृति; अष्टधा: आठ प्रकार से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – इस प्रकार यह मेरी प्रकृति आठ प्रकार से विभाजित है।

English Translation

Earth, water, fire, air, ether, mind, intellect and egoism – thus is My Prakriti divided eightfold.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण अपनी अपरा (भौतिक) प्रकृति के आठ घटक बताते हैं। ये सभी जड़ तत्त्व हैं और जीव के उपकरण हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।