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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 3

अध्याय 7 · श्लोक 3

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३॥

manuṣyāṇāṃ sahasreṣu kaścid yatati siddhaye | yatatām api siddhānāṃ kaścin māṃ vetti tattvataḥ ||3||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मनुष्याणाम्: मनुष्यों में; सहस्रेषु: हजारों में; कश्चित्: कोई एक; यतति: प्रयत्न करता है; सिद्धये: सिद्धि के लिए; यतताम्: प्रयत्न करते हुए; अपि: भी; सिद्धानाम्: सिद्धों में; कश्चित्: कोई एक; माम्: मुझे; वेत्ति: जानता है; तत्त्वतः: तत्त्व से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हजारों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि (पूर्णता) के लिए प्रयत्न करता है; और उन प्रयत्नशील सिद्धों में से भी कोई एक ही मुझे तत्त्व से जानता है।

English Translation

Among thousands of men, one perchance strives for perfection; even among those striving and perfect, only one knows Me in truth.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक आत्मज्ञान और ईश्वर-प्राप्ति की दुर्लभता को दर्शाता है। लाखों में एक को ही परम सत्य का बोध होता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।