श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 2

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 26 मिनट का पठन 143 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्ञानं ते ऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
ज्ञानम्
ज्ञान
ते
तुझे
अहम्
मैं
सविज्ञानम्
विज्ञान सहित
इदम्
यह
वक्ष्यामि
कहूँगा
अशेषतः
सम्पूर्ण रूप से
यत्
जिसे
ज्ञात्वा
जानकर
न
नहीं
इह
इस लोक में
भूयः
फिर
अन्यत्
अन्य कुछ
ज्ञातव्यम्
जानने योग्य
अवशिष्यते
शेष रहता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं तुझे इस ज्ञान और विज्ञान सहित सम्पूर्ण रूप से कहूँगा, जिसे जानने के बाद इस लोक में फिर कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रहता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ज्ञानं ते ऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः - आध्यात्मिक विवेचना

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का सप्तम अध्याय 'ज्ञान-विज्ञान योग' के नाम से विख्यात है। यह वह पावन सोपान है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उस परम सत्य का दर्शन कराते हैं, जिसे जान लेने के पश्चात मनुष्य के लिए इस संसार में कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। भारतीय दर्शन में 'ज्ञान' और 'विज्ञान' का समन्वय अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहाँ 'ज्ञान' का अर्थ शास्त्रों के सैद्धांतिक अध्ययन से है, वहीं 'विज्ञान' का तात्पर्य उस ज्ञान के प्रत्यक्ष अनुभव और अनुभूति से है।

जब हम इस श्लोक का चिंतन करते हैं, तो हमें यह बोध होता है कि परमात्मा स्वयं अपने भक्त को वह विद्या प्रदान करने का संकल्प ले रहे हैं जो पूर्ण है। यह केवल शब्दों का जाल नहीं, अपितु चेतना का वह रूपांतरण है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर आत्मा को परमात्मा के साक्षात दर्शन कराने में समर्थ है। सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन की सार्थकता भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उस आत्म-ज्ञान में है जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाता है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह श्लोक उस आदि-स्रोत की ओर संकेत करता है जिससे संपूर्ण सृष्टि का सृजन, पालन और संहार होता है। जब साधक इस ज्ञान को आत्मसात करता है, तो उसके भीतर का द्वैत समाप्त हो जाता है और वह स्वयं को उस विराट सत्ता का अभिन्न अंग अनुभव करने लगता है। यह श्लोक केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि एक दिव्य मार्गदर्शिका है जो साधक को अज्ञान की निद्रा से जगाकर परम पद की ओर अग्रसर करती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ज्ञानं ते ऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।

यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'ज्ञानं' शब्द पर अनुस्वार का स्पष्ट उच्चारण करें। 'सविज्ञानमिदं' में संधि का ध्यान रखते हुए इसे लयबद्ध तरीके से पढ़ें। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके तीन बार इस श्लोक का पाठ करना मानसिक एकाग्रता और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। इसे कंठस्थ करना स्वयं में एक साधना है, जो बुद्धि को प्रखर और हृदय को निर्मल बनाती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ज्ञानम्सैद्धांतिक ज्ञानशास्त्रों का वह बोध जो सत्य और असत्य का भेद स्पष्ट करता है।
तेतुम्हारे लिएभगवान का भक्त के प्रति वात्सल्य और कृपा का भाव।
अहम्मैंस्वयं पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, जो ज्ञान के आदि स्रोत हैं।
सविज्ञानम्अनुभव सहित ज्ञानकेवल पढ़ना नहीं, बल्कि उस सत्य को जीवन में उतारना।
इदम्यहवर्तमान में जो ज्ञान दिया जा रहा है, वह प्रत्यक्ष है।
वक्ष्यामिकहूँगाभगवान का संकल्प कि वे स्वयं शिष्य को सत्य का मार्ग दिखाएंगे।
अशेषतःपूर्ण रूप सेबिना किसी कमी के, संपूर्ण और समग्र सत्य।
यज्ज्ञात्वाजिसे जानकरउस सत्य का बोध जो अज्ञान को जड़ से मिटा दे।
नेहइस संसार मेंभौतिक जगत की सीमाओं के परे का सत्य।
भूयःपुनःदोबारा कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं रहती।
ज्ञातव्यम्जानने योग्यसंसार में जानने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचता।
अवशिष्यतेशेष रहता हैपूर्णता की अवस्था, जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के रणभूमि में उस समय उच्चारित हुआ था जब अर्जुन मोह और विषाद से ग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो रहे थे। महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली गीता, साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से निकली अमृतवाणी है। पौराणिक संदर्भों में, ज्ञान का यह मार्ग उपनिषदों के सार के रूप में जाना जाता है। उपनिषदों में कहा गया है—'यस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति' (जिसके जान लेने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है)। श्रीकृष्ण इसी वैदिक परंपरा को अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता के लिए पुनर्जीवित कर रहे हैं।

इतिहास साक्षी है कि जब-जब धर्म की ग्लानि हुई है, तब-तब भगवान ने ज्ञान के माध्यम से ही समाज का मार्ग प्रशस्त किया है। यह श्लोक केवल एक संवाद नहीं, बल्कि एक 'दीक्षा' है। जिस प्रकार गुरु अपने शिष्य को गुप्त विद्या प्रदान करता है, उसी प्रकार यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को 'राजविद्या' प्रदान कर रहे हैं। यह ज्ञान वेदों के गूढ़ रहस्यों का निचोड़ है। पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि जो भी साधक इस ज्ञान के रहस्य को समझ लेता है, वह काल के चक्र से मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान न तो केवल बुद्धि का विषय है और न ही केवल तर्क का, यह तो हृदय की उस अवस्था का नाम है जहाँ भक्त और भगवान एक हो जाते हैं। महाभारत के युद्ध के बीच में इस ज्ञान का अवतरण यह सिद्ध करता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए किसी एकांत गुफा की आवश्यकता नहीं है, बल्कि कर्तव्य पथ पर चलते हुए भी परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्पष्टता: नियमित पाठ से मन के भीतर चल रहे द्वंद्व और भ्रम का निवारण होता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: यह श्लोक बुद्धि को सूक्ष्म बनाता है, जिससे कठिन विषयों को समझने की क्षमता बढ़ती है।
  • अहंकार का शमन: 'ज्ञानं ते' का भाव साधक के भीतर यह बोध जगाता है कि सब कुछ परमात्मा का ही है।
  • भय से मुक्ति: जब मनुष्य को यह ज्ञात हो जाता है कि जानने योग्य केवल परमात्मा है, तो मृत्यु और हानि का भय समाप्त हो जाता है।
  • कर्मिक शुद्धि: इस दिव्य ज्ञान का चिंतन करने से संचित कर्मों का प्रभाव क्षीण होने लगता है।
  • दिव्य आभा का निर्माण: निरंतर पाठ से साधक के व्यक्तित्व में एक सात्विक तेज और शांति का संचार होता है।
  • ईश्वरीय कृपा: यह श्लोक भगवान को प्रिय है, अतः इसके पाठ से भक्त पर उनकी विशेष कृपा दृष्टि बनी रहती है।
  • संसार से वैराग्य: यह भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति को कम कर आत्म-सुख की ओर प्रेरित करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम अध्याय के श्लोक संख्या 2 पर आधारित है। यहाँ प्रस्तुत सभी व्याख्याएं पारंपरिक भाष्यकारों जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुजाचार्य और आधुनिक वेदांत विद्वानों के दृष्टिकोणों का समन्वय हैं। यह 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसका उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों से सरल भाषा में परिचित कराना है। हम पाठकों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित 'श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप' या अन्य प्रामाणिक संस्करणों का अध्ययन अवश्य करें ताकि वे मूल ग्रंथों की गहराई को स्वयं अनुभव कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

ज्ञान का अर्थ है शास्त्रों का सैद्धांतिक बोध, जबकि विज्ञान का अर्थ है उस ज्ञान का प्रत्यक्ष अनुभव। जब आप यह जान लेते हैं कि 'मैं आत्मा हूँ', तो वह ज्ञान है, लेकिन जब आप उसे अनुभव करते हैं, तो वह विज्ञान है।

हाँ, जब मनुष्य को परम सत्य का ज्ञान हो जाता है, तो उसकी सांसारिक समस्याओं के प्रति दृष्टिकोण बदल जाता है। वह समस्याओं को केवल एक खेल के रूप में देखता है, जिससे उसका तनाव स्वतः समाप्त हो जाता है।

नहीं, अर्जुन केवल एक निमित्त थे। भगवान श्रीकृष्ण ने यह ज्ञान संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए दिया है। जो भी व्यक्ति अर्जुन की तरह जिज्ञासु है, वह इस ज्ञान का अधिकारी है।

ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) का समय इसके लिए सर्वोत्तम है, क्योंकि इस समय मन शांत और ग्रहणशील होता है। हालांकि, भक्ति में समय का बंधन नहीं है, इसे कभी भी पढ़ा जा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि आप कर्म करना छोड़ दें। इसका अर्थ यह है कि अब आप जो भी कर्म करेंगे, वह अज्ञानवश नहीं, बल्कि पूर्ण जागृति के साथ करेंगे। आप मुक्त होकर कर्म करेंगे।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: मैं तुझे इस ज्ञान (सिद्धांत) और विज्ञान (अनुभव) सहित सम्पूर्ण रूप से बताऊँगा। जिसे जान लेने के बाद इस संसार में और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

पूर्ण ज्ञान वह है जो न केवल बौद्धिक स्तर पर हो, बल्कि जीवन में उतरकर अनुभव भी किया जाए। ईश्वर को जान लेना ही सब कुछ जान लेना है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 2 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 2/30 7% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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