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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 1

अध्याय 7 · श्लोक 1

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १॥

śrī-bhagavān uvāca mayy āsakta-manāḥ pārtha yogaṃ yuñjan mad-āśrayaḥ | asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tac chṛṇu ||1||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान् उवाच: भगवान् ने कहा; मयि: मुझमें; आसक्तमनाः: आसक्त मन वाला; पार्थ: हे पार्थ; योगम्: योग का; युञ्जन्: अभ्यास करता हुआ; मदाश्रयः: मेरे आश्रय में रहकर; असंशयम्: संशयरहित; समग्रम्: सम्पूर्ण; माम्: मुझे; यथा: जैसे; ज्ञास्यसि: तू जानेगा; तत्: उसे; शृणु: सुन।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ! मुझमें आसक्त मनवाला, योग का अभ्यास करता हुआ तथा मेरे आश्रय में रहकर तुम मुझे संपूर्णतया और संशयरहित होकर कैसे जानोगे, उसे सुनो।

English Translation

The Blessed Lord said: O Partha, with mind attached to Me, practicing Yoga, taking refuge in Me, how you shall know Me without doubt, completely – hear that.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक अध्याय ७ का प्रारम्भ है, जिसमें कृष्ण अर्जुन को आश्वासन देते हैं कि वे उन्हें पूर्ण रूप से जानने का उपाय बताएँगे। मुख्य शर्त है मन को कृष्ण में लगाना और उनकी शरण में रहना।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।