श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 1

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 26 मिनट का पठन 154 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
श्रीभगवान् उवाच
भगवान् ने कहा
मयि
मुझमें
आसक्तमनाः
आसक्त मन वाला
पार्थ
हे पार्थ
योगम्
योग का
युञ्जन्
अभ्यास करता हुआ
मदाश्रयः
मेरे आश्रय में रहकर
असंशयम्
संशयरहित
समग्रम्
सम्पूर्ण
माम्
मुझे
यथा
जैसे
ज्ञास्यसि
तू जानेगा
तत्
उसे
शृणु
सुन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ! मुझमें आसक्त मनवाला, योग का अभ्यास करता हुआ तथा मेरे आश्रय में रहकर तुम मुझे संपूर्णतया और संशयरहित होकर कैसे जानोगे, उसे सुनो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का सातवां अध्याय 'ज्ञान-विज्ञान योग' के नाम से विख्यात है। यह अध्याय उस संक्रमण बिंदु को दर्शाता है जहाँ अर्जुन का मन सांसारिक द्वंद्वों से ऊपर उठकर ईश्वरीय तत्व को समझने के लिए तैयार होता है। श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ... यह श्लोक केवल एक निर्देश नहीं, बल्कि एक दिव्य मार्गदर्शिका है जो साधक को 'अहं' से 'ब्रह्म' की यात्रा का सूत्र प्रदान करती है।

वैदिक संस्कृति में, ज्ञान का अर्थ केवल सूचनाओं का संचय नहीं, बल्कि 'अनुभव' है। जब भगवान कृष्ण अर्जुन को 'मय्यासक्तमनाः' (मुझमें मन को आसक्त करके) होने का उपदेश देते हैं, तो वे एक ऐसी मनोवैज्ञानिक तकनीक साझा कर रहे हैं जो मनुष्य को भौतिक जगत की नश्वरता से मुक्त कर शाश्वत आनंद की ओर ले जाती है। यह श्लोक ब्रह्मांड के उस रहस्य को उद्घाटित करता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक भारतीय दर्शन की उस आधारशिला को पुष्ट करता है जिसमें 'शरणागति' को मोक्ष का एकमात्र सरल मार्ग माना गया है। इस श्लोक का महत्व इस बात में निहित है कि यह जटिल दार्शनिक सिद्धांतों को एक व्यावहारिक जीवन शैली में परिवर्तित कर देता है। जब हम अपने मन को परमात्मा के चरणों में समर्पित करते हैं, तो हमारे कर्म स्वतः ही निष्काम हो जाते हैं, और हम उस समग्र ज्ञान को प्राप्त करने के अधिकारी बन जाते हैं जो वेदों और उपनिषदों का सार है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि ईश्वर को जानना कोई बौद्धिक व्यायाम नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण की एक निरंतर प्रक्रिया है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १॥

इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। गीता के सातवें अध्याय का पाठ करने से पूर्व भगवान गणेश और गुरु का स्मरण करना अनिवार्य है। इस श्लोक की विधि केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि मन को कृष्ण के स्वरूप में तल्लीन करना है। 'मय्यासक्तमनाः' का अर्थ है—अपने मन को भगवान के गुणों, उनकी लीलाओं और उनके दिव्य स्वरूप में इस प्रकार पिरो देना जैसे धागे में मोती पिरोए जाते हैं। 'मदाश्रयः' का अर्थ है—पूर्ण रूप से भगवान पर आश्रित हो जाना, जैसे एक छोटा बालक अपनी माता की गोद में सुरक्षित अनुभव करता है। जब साधक इस भाव के साथ इस श्लोक का जप करता है, तो उसके भीतर की अज्ञानता रूपी अंधकार धीरे-धीरे छंटने लगता है। यह श्लोक केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि एक 'अनुभव' है जिसे प्रतिदिन के ध्यान में सम्मिलित करने से साधक की चेतना का विस्तार होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
मय्यासक्तमनाःमुझमें आसक्त मन वालासांसारिक मोह को त्यागकर मन को पूर्णतः परमात्मा में लीन करना।
पार्थहे अर्जुन (पृथा के पुत्र)आत्मा को संबोधित करना जो कर्मक्षेत्र में संघर्षरत है।
योगं युञ्जन्योग का अभ्यास करते हुएनिरंतर ईश्वर के साथ जुड़ने की मानसिक प्रक्रिया।
मदाश्रयःमेरी शरण में स्थितअहंकार का त्याग कर पूर्ण समर्पण की स्थिति।
असंशयंबिना किसी संदेह केश्रद्धा की वह अवस्था जहाँ तर्क का स्थान विश्वास ले लेता है।
समग्रंपूर्ण रूप सेईश्वर के सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों का बोध।
मांमुझको (श्रीकृष्ण को)परम सत्य, जो स्वयं पुरुषोत्तम हैं।
यथा ज्ञास्यसिजिस प्रकार जानोगेज्ञान की उस पराकाष्ठा का संकेत जो अनुभवजन्य है।
तच्छृणुउसे सुनोगुरु के वचनों के प्रति पूर्ण एकाग्रता और श्रवण भक्ति।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में, जब अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने धनुष को त्याग देते हैं, तब श्री कृष्ण उन्हें जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध कराने हेतु गीता का उपदेश देते हैं। सातवां अध्याय 'ज्ञान-विज्ञान योग' के रूप में जाना जाता है। पौराणिक संदर्भों में, यह अध्याय उस समय का है जब युद्ध की विभीषिका के बीच अर्जुन ने कृष्ण से यह प्रश्न किया था कि वे उन्हें कैसे समझें। कृष्ण का यह उत्तर—'मय्यासक्तमनाः'—वेदों के उस महावाक्य 'तत्त्वमसि' का व्यावहारिक रूप है।

ऋषियों और मुनियों ने इस श्लोक को 'भक्ति का प्रवेश द्वार' कहा है। महाभारत की कथा के अनुसार, जब पांडव वनवास और अज्ञातवास के कठिन दौर से गुजर रहे थे, तब भी उन्होंने कृष्ण को ही अपना आधार माना था। यह श्लोक केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि आने वाली समस्त पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक है। वेदों में 'श्रवण' को ज्ञान का प्रथम सोपान माना गया है। कृष्ण यहाँ अर्जुन को 'तच्छृणु' (उसे सुनो) कहकर यह संकेत देते हैं कि जब तक शिष्य का मन शांत और ग्रहणशील नहीं होता, तब तक सत्य का प्रकाश उसमें प्रवेश नहीं कर सकता। यह श्लोक उपनिषदों की उस परंपरा को आगे बढ़ाता है जहाँ गुरु और शिष्य के बीच संवाद से ब्रह्मज्ञान का उदय होता है। कृष्ण यहाँ स्वयं को 'समग्र' (पूर्ण) बताते हैं, जो यह स्पष्ट करता है कि उनके अतिरिक्त जानने योग्य कुछ भी शेष नहीं है। यह श्लोक हमें यह भी याद दिलाता है कि ज्ञान का मार्ग कठिन अवश्य है, परंतु यदि आधार 'मदाश्रयः' (ईश्वर की शरण) हो, तो वह मार्ग अत्यंत सुगम और आनंदमय हो जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक एकाग्रता: 'मय्यासक्तमनाः' का निरंतर चिंतन करने से मन की चंचलता समाप्त होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • भय और चिंता का नाश: 'मदाश्रयः' भाव को अपनाने से साधक के भीतर से भविष्य का भय और वर्तमान की चिंताएं समाप्त हो जाती हैं।
  • कर्म शुद्धि: जब हम योग का अभ्यास करते हुए कार्य करते हैं, तो हमारे कर्मों का फल हमें बंधन में नहीं डालता।
  • आध्यात्मिक आभा (Aura): इस श्लोक के जप से साधक के चारों ओर एक सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा का घेरा बनता है।
  • संदेह मुक्ति: 'असंशयं' का अर्थ है संदेह का नाश। यह श्लोक साधक के मन में ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास पैदा करता है।
  • आत्म-साक्षात्कार: समग्र ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है, जिससे साधक स्वयं को पहचानने लगता है।
  • दैवीय कृपा: भगवान की शरण में रहने से साधक को कठिन परिस्थितियों में भी आंतरिक शांति का अनुभव होता है।
  • अहंकार का विसर्जन: यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि वह केवल एक निमित्त है, कर्ता स्वयं परमात्मा हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत पाठ, शंकराचार्य भाष्य और स्वामी रामसुखदास जी की 'साधक संजीवनी' के सिद्धांतों पर आधारित है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या का उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत ज्ञान प्रदान करना है। समस्त श्लोक और उनके अर्थों को प्रामाणिक गीता प्रेस, गोरखपुर के संस्करणों के अनुरूप रखा गया है। यह सामग्री आध्यात्मिक शोध और भक्ति मार्ग के जिज्ञासुओं के लिए एक विश्वसनीय मार्गदर्शिका है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इसका अर्थ है कि आप अपने दैनिक कार्यों को करते हुए भी अपने मन को ईश्वर के चिंतन में रखें। जैसे एक माँ काम करते हुए भी अपने बच्चे का ध्यान रखती है, वैसे ही साधक को संसार में रहते हुए भी ईश्वर को केंद्र में रखना चाहिए।

मोक्ष एक लंबी यात्रा है। यह श्लोक उस यात्रा का प्रथम चरण है। निरंतर अभ्यास और समर्पण से चित्त की शुद्धि होती है, जो अंततः आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष की ओर ले जाती है।

मदाश्रयः का अर्थ है कि अपने सुख-दुख, सफलता-असफलता का भार ईश्वर पर छोड़ देना। यह पूर्ण शरणागति है, जहाँ साधक का अपना अहंकार समाप्त हो जाता है।

निश्चित रूप से। गीता का उपदेश अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिया गया था, जो एक गृहस्थ और क्षत्रिय थे। यह श्लोक सिखाता है कि सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए भी ईश्वर से कैसे जुड़ा जाए।

समग्र का अर्थ है भगवान का वह स्वरूप जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। कृष्ण यहाँ अर्जुन को यह बताना चाहते हैं कि वे केवल एक मनुष्य नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के आधार हैं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: हे अर्जुन! अपने मन को मुझमें आसक्त करो, योग (समाधि) का अभ्यास करो और मेरी शरण में रहो। तब तुम निःसंदेह मुझे सम्पूर्ण रूप से जान सकोगे – उसे सुनो।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ज्ञान की प्राप्ति के लिए एकाग्र मन, अभ्यास, और ईश्वर के प्रति समर्पण आवश्यक है। बिना श्रद्धा और समर्पण के परम तत्त्व को जानना असंभव है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 1 का अध्ययन कर रहे हैं।
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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