श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 10

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 23 मिनट का पठन 156 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
बीजम्
बीज
माम्
मुझे
सर्वभूतानाम्
समस्त प्राणियों का
विद्धि
जान
पार्थ
हे पार्थ
सनातनम्
सनातन
बुद्धि
बुद्धि
बुद्धिमताम्
बुद्धिमानों में
अस्मि
हूँ
तेजः
तेज
तेजस्विनाम्
तेजस्वियों में
अहम्
मैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पार्थ! मुझे समस्त प्राणियों का सनातन बीज जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ और तेजस्वियों का तेज हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

बीजं मां सर्वभूतानां - श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य दर्शन

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का दशम अध्याय 'विभूतियोग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी अनंत विभूतियों का परिचय देते हैं, ताकि भक्त का मन सांसारिक तुच्छताओं से ऊपर उठकर उस परम तत्व में लीन हो सके। प्रस्तुत श्लोक—"बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्"—संपूर्ण सृष्टि के मूल आधार को समझने की कुंजी है। यहाँ भगवान स्पष्ट करते हैं कि वे केवल एक दूरस्थ ईश्वर नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान 'बीज' हैं। जिस प्रकार एक विशाल वटवृक्ष एक सूक्ष्म बीज में अव्यक्त रूप से समाया रहता है, उसी प्रकार यह संपूर्ण चराचर जगत भगवान के संकल्प मात्र से अस्तित्व में है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक अद्वैत दर्शन की पराकाष्ठा है। यह हमें सिखाता है कि हम जो भी बुद्धि, मेधा, तेज या प्रतिभा अपने भीतर अनुभव करते हैं, वह हमारी निजी संपत्ति नहीं, बल्कि उस परमात्मा का ही अंश है। जब मनुष्य यह जान लेता है कि उसकी बुद्धि का स्रोत वही सनातन पुरुष है, तो उसके अहंकार का स्वतः ही शमन हो जाता है। यह श्लोक न केवल दार्शनिक है, बल्कि यह जीवन जीने की एक पद्धति भी है। यह हमें सिखाता है कि प्रत्येक प्राणी में ईश्वर को देखना ही वास्तविक धर्म है। इस श्लोक का चिंतन करने से साधक के भीतर एक ऐसी दिव्य दृष्टि विकसित होती है, जिससे वह संसार के प्रत्येक कण में उस अनंत ब्रह्म की उपस्थिति का अनुभव करने लगता है। यह बोध ही मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करने में सक्षम है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'बीजं' शब्द पर थोड़ा बल दें, जो सृष्टि के मूल स्रोत को दर्शाता है। 'सनातनम्' शब्द का उच्चारण करते समय उस शाश्वत सत्ता का स्मरण करें जो आदि और अंत से परे है। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस श्लोक का 11 बार जप करने से बुद्धि में प्रखरता और व्यक्तित्व में दिव्य तेज की वृद्धि होती है। यह श्लोक एकाग्रता बढ़ाने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
बीजम्बीज, कारणसृष्टि का वह सूक्ष्म तत्व जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है।
माम्मुझेस्वयं भगवान श्रीकृष्ण, जो परम ब्रह्म हैं।
सर्वभूतानाम्समस्त प्राणियों कासंसार के सभी जीव-जंतु, चर और अचर।
विद्धिजानोइसे केवल जानकारी न समझें, इसे अनुभव का विषय बनाएं।
पार्थहे अर्जुनकुंतीपुत्र, जो पुरुषार्थ का प्रतीक है।
सनातनम्शाश्वत, नित्यजो कभी नष्ट नहीं होता, जो सदा से है।
बुद्धिःविवेक, मेधानिर्णय लेने की शक्ति और सत्य-असत्य का ज्ञान।
बुद्धिमताम्बुद्धिमानों मेंवे लोग जो विवेक का उपयोग करते हैं।
तेजःप्रभाव, ओजव्यक्तित्व का वह आकर्षण जो दिव्यता से आता है।
तेजस्विनाम्तेजस्वियों मेंवे लोग जो अपनी आभा से समाज को आलोकित करते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में उस समय उच्चारित हुआ जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह समझाने के लिए कि 'मैं ही सब कुछ हूँ', अपनी विभूतियों का वर्णन किया। यह प्रसंग महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है। पौराणिक संदर्भों में, भगवान विष्णु के अवतार के रूप में श्रीकृष्ण ने स्वयं को 'बीज' कहा है, जो सांख्य दर्शन के 'प्रकृति' और 'पुरुष' के मिलन का संकेत है।

वेदों में भी 'हिरण्यगर्भ' की अवधारणा है, जो सृष्टि का प्रथम बीज है। उपनिषदों में कहा गया है—"सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (यह सब कुछ ब्रह्म ही है)। इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण उसी उपनिषदीय सत्य को सरल भाषा में अर्जुन के समक्ष रख रहे हैं। जब हम पुराणों का अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनकी बुद्धि और तेज का स्रोत सदैव परमात्मा ही रहा है। चाहे वह महर्षि वशिष्ठ का ज्ञान हो या अर्जुन का पराक्रम, सब उस सनातन बीज की ही अभिव्यक्ति है। यह श्लोक हमें यह भी याद दिलाता है कि हम अहंकार के वशीभूत होकर अपनी उपलब्धियों का श्रेय स्वयं को न दें, बल्कि उस परम सत्ता के प्रति कृतज्ञ रहें। यह ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि हमें यह समझने में मदद करती है कि गीता केवल एक युद्ध का संवाद नहीं, बल्कि जीवन के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने वाला एक महाग्रंथ है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक एकाग्रता: इस श्लोक का नियमित जप करने से मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
  • अहंकार का नाश: यह बोध कि हमारी बुद्धि ईश्वर की देन है, अहंकार को समाप्त कर विनम्रता लाता है।
  • तेज की प्राप्ति: साधक के मुखमंडल पर एक दिव्य ओज और तेज का संचार होता है।
  • निर्णय लेने की क्षमता: बुद्धि में प्रखरता आती है, जिससे कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने की शक्ति मिलती है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: यह श्लोक नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मक और सात्विक ऊर्जा का संचार करता है।
  • आत्म-साक्षात्कार: स्वयं के भीतर उस सनातन बीज को खोजने की प्रेरणा मिलती है।
  • कर्म शुद्धि: जब हम यह जान जाते हैं कि सब कुछ ईश्वर का है, तो हमारे कर्म निष्काम होने लगते हैं।
  • दैवीय सुरक्षा: निरंतर इस श्लोक का स्मरण करने से साधक को ईश्वरीय संरक्षण का अनुभव होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय (विभूतियोग) के श्लोक संख्या 10 पर आधारित है। हमने गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित 'श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप' और स्वामी रामसुखदास जी की 'साधक संजीवनी' जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर इस व्याख्या को संकलित किया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्रसम्मत और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध जानकारी प्रदान करना है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अवैज्ञानिक दावों से मुक्त है और पूर्णतः सनातन धर्म के सिद्धांतों पर आधारित है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इसका अर्थ है कि भगवान श्रीकृष्ण ही समस्त प्राणियों के मूल कारण या बीज हैं। जैसे बीज में वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही संसार भगवान में छिपा है।

हाँ, यह श्लोक बुद्धि और तेज का स्रोत बताता है। विद्यार्थियों के लिए इसका जप करना उनकी मेधा शक्ति और स्मरण शक्ति को बढ़ाने में सहायक हो सकता है।

तेजस्वी वह है जिसके भीतर परमात्मा का प्रकाश झलकता है। यह केवल शारीरिक सौंदर्य नहीं, बल्कि चरित्र और ज्ञान की आभा है।

प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में इसका पाठ करना सबसे उत्तम है, लेकिन भक्ति में समय का बंधन नहीं है। आप इसे कभी भी स्मरण कर सकते हैं।

सनातन का अर्थ है जो अनादि काल से है और अनंत काल तक रहेगा। यह नित्य, शाश्वत और अपरिवर्तनीय सत्य है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन! मुझे समस्त प्राणियों का सनातन बीज (मूल कारण) जानो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ और तेजस्वियों का तेज हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर ही सबका आदि कारण है। जो कुछ भी श्रेष्ठ है – बुद्धि, तेज – वह उसी का अंश है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/30 33% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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