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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 11

अध्याय 7 · श्लोक 11

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामो ऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११॥

balaṃ balavatāṃ cāhaṃ kāma-rāga-vivarjitam | dharmāviruddho bhūteṣu kāmo ’smi bharatarṣabha ||11||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

बलम्: बल; बलवताम्: बलवानों का; च: और; अहम्: मैं; कामरागविवर्जितम्: काम और आसक्ति से रहित; धर्माविरुद्धः: धर्म के विरुद्ध न होने वाला; भूतेषु: प्राणियों में; कामः: काम; अस्मि: हूँ; भरतर्षभ: हे भरतश्रेष्ठ।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का बल हूँ, जो काम और आसक्ति से रहित है। तथा प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न होने वाली कामना मैं हूँ।

English Translation

I am the strength of the strong, devoid of desire and attachment. I am the desire in beings, O best of the Bharatas, which is not contrary to Dharma.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ईश्वर बल का स्रोत है, किन्तु वह बल जो आसक्ति रहित और धर्मानुकूल हो। धर्मसम्मत इच्छा भी ईश्वर का ही रूप है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।