पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का बल हूँ, जो काम और आसक्ति से रहित है। तथा प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न होने वाली कामना मैं हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व
श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' के नाम से जाना जाता है, में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी अनंत विभूतियों का परिचय देते हैं। इस श्लोक—"बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामो ऽस्मि भरतर्षभ ॥"—के माध्यम से भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि इस संसार में जो कुछ भी सामर्थ्य, शक्ति और इच्छाशक्ति दृष्टिगोचर होती है, वह वास्तव में उन्हीं का स्वरूप है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक कथन नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक मनुष्य को उसके अहंकार से मुक्त करने का एक सशक्त माध्यम है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारे भीतर का 'बल' (शक्ति) हमारा अपना नहीं, बल्कि ईश्वर का अंश है, तो हमारे भीतर से 'अहंकार' का लोप होने लगता है। 'कामरागविवर्जितम्' का अर्थ है—वह बल जो आसक्ति और राग-द्वेष से रहित हो। यह वह शक्ति है जो अधर्म के लिए नहीं, बल्कि लोक-कल्याण और धर्म की स्थापना के लिए प्रयुक्त होती है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह श्लोक हमें सिखाता है कि इच्छा (काम) भी ईश्वर का ही एक रूप है, बशर्ते वह धर्म के विरुद्ध न हो। यदि हमारी इच्छाएं धर्म की मर्यादा में बंधी हैं, तो वे हमें ईश्वर के समीप ले जाती हैं। यह श्लोक हमें आत्म-संयम, शक्ति का सदुपयोग और धर्मपरायणता का मार्ग दिखाता है, जो भारतीय संस्कृति के मूल स्तंभ हैं।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामो ऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११॥
अन्वय: हे भरतर्षभ! अहं बलवतां कामरागविवर्जितं बलं च, भूतेषु धर्माविरुद्धः कामः अस्मि।
इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर भगवान के विभूति स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके गीता के दशम अध्याय का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। विधिपूर्वक पाठ करने से मन में सात्विक विचारों का उदय होता है और व्यक्ति के भीतर छिपी हुई नकारात्मक शक्तियां सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित होने लगती हैं। यह श्लोक विशेष रूप से उन लोगों के लिए प्रेरणादायक है जो अपने जीवन में शक्ति और इच्छाओं के संतुलन को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में उस समय उच्चारित हुआ जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें 'विभूतियोग' के माध्यम से यह समझाया कि इस संसार में जो कुछ भी उत्कृष्ट, शक्तिशाली और धर्म के अनुकूल है, वह सब उन्हीं की विभूति है। महाभारत के संदर्भ में, यह श्लोक अर्जुन को यह बोध कराता है कि उनका युद्ध करना 'अधर्म' नहीं है, क्योंकि यह युद्ध धर्म की स्थापना के लिए है।
पौराणिक ग्रंथों में, विशेषकर उपनिषदों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि परमात्मा ही समस्त शक्तियों का मूल स्रोत है। केनोपनिषद में भी देवताओं के अहंकार को तोड़ने के लिए यक्ष के रूप में ब्रह्म का आगमन होता है, जो यह सिद्ध करता है कि देवताओं की शक्ति भी ब्रह्म से ही प्राप्त है। इसी प्रकार, गीता का यह श्लोक 'बल' और 'काम' (इच्छा) के आध्यात्मिक स्वरूप को परिभाषित करता है। 'काम' को सामान्यतः संसार में बंधन का कारण माना जाता है, परंतु यहाँ भगवान ने 'धर्माविरुद्ध' (धर्म के अनुकूल) कामना को अपना स्वरूप बताकर यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि इच्छाएं सात्विक हों, तो वे मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि शक्ति का उपयोग केवल दूसरों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए। भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन को संबोधित करते हुए, भगवान उन्हें उनके क्षत्रिय धर्म का स्मरण कराते हैं, जो कि धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि धर्म का रक्षक है। यह ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भ हमें यह समझने में मदद करता है कि आध्यात्मिक जीवन और व्यावहारिक जीवन में कोई विरोध नहीं है, यदि हमारा दृष्टिकोण धर्म सम्मत हो।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' (Editorially Curated Content) है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय (विभूतियोग) के प्रामाणिक श्लोकों, शंकराचार्य भाष्य और विभिन्न वैष्णव आचार्यों की टीकाओं के आधार पर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल और बोधगम्य भाषा में प्रस्तुत करना है। सभी संदर्भ गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों से प्रेरित हैं, ताकि पाठकों को शुद्ध और त्रुटिहीन आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो सके।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का वह बल हूँ जो कामना और आसक्ति से रहित है। तथा प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम (इच्छा) मैं हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर सद्गुणों और शुभ प्रवृत्तियों का आधार है। बल और इच्छा भी यदि सात्त्विक और धर्मसम्मत हों तो वे ईश्वरीय अंश हैं।