श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 11

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 26 मिनट का पठन 145 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामो ऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
बलम्
बल
बलवताम्
बलवानों का
च
और
अहम्
मैं
कामरागविवर्जितम्
काम और आसक्ति से रहित
धर्माविरुद्धः
धर्म के विरुद्ध न होने वाला
भूतेषु
प्राणियों में
कामः
काम
अस्मि
हूँ
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का बल हूँ, जो काम और आसक्ति से रहित है। तथा प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न होने वाली कामना मैं हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' के नाम से जाना जाता है, में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी अनंत विभूतियों का परिचय देते हैं। इस श्लोक—"बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामो ऽस्मि भरतर्षभ ॥"—के माध्यम से भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि इस संसार में जो कुछ भी सामर्थ्य, शक्ति और इच्छाशक्ति दृष्टिगोचर होती है, वह वास्तव में उन्हीं का स्वरूप है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक कथन नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक मनुष्य को उसके अहंकार से मुक्त करने का एक सशक्त माध्यम है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारे भीतर का 'बल' (शक्ति) हमारा अपना नहीं, बल्कि ईश्वर का अंश है, तो हमारे भीतर से 'अहंकार' का लोप होने लगता है। 'कामरागविवर्जितम्' का अर्थ है—वह बल जो आसक्ति और राग-द्वेष से रहित हो। यह वह शक्ति है जो अधर्म के लिए नहीं, बल्कि लोक-कल्याण और धर्म की स्थापना के लिए प्रयुक्त होती है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह श्लोक हमें सिखाता है कि इच्छा (काम) भी ईश्वर का ही एक रूप है, बशर्ते वह धर्म के विरुद्ध न हो। यदि हमारी इच्छाएं धर्म की मर्यादा में बंधी हैं, तो वे हमें ईश्वर के समीप ले जाती हैं। यह श्लोक हमें आत्म-संयम, शक्ति का सदुपयोग और धर्मपरायणता का मार्ग दिखाता है, जो भारतीय संस्कृति के मूल स्तंभ हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामो ऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११॥


अन्वय: हे भरतर्षभ! अहं बलवतां कामरागविवर्जितं बलं च, भूतेषु धर्माविरुद्धः कामः अस्मि।

इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर भगवान के विभूति स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके गीता के दशम अध्याय का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। विधिपूर्वक पाठ करने से मन में सात्विक विचारों का उदय होता है और व्यक्ति के भीतर छिपी हुई नकारात्मक शक्तियां सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित होने लगती हैं। यह श्लोक विशेष रूप से उन लोगों के लिए प्रेरणादायक है जो अपने जीवन में शक्ति और इच्छाओं के संतुलन को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
बलं शक्ति / सामर्थ्य यह वह ईश्वरीय ऊर्जा है जो जीव को कर्म करने की क्षमता प्रदान करती है।
बलवतां बलवानों में शक्तिशाली व्यक्तियों के भीतर जो तेज है, वह ईश्वर का ही प्रतिबिंब है।
कामरागविवर्जितम् आसक्ति और राग से रहित वह शक्ति जो स्वार्थ या वासना से दूषित न हो, वही वास्तविक ईश्वरीय बल है।
धर्माविरुद्धो धर्म के विरुद्ध न हो जो इच्छाएं शास्त्रों और नैतिकता की मर्यादा में हों, वही ईश्वर का स्वरूप हैं।
भूतेषु समस्त प्राणियों में ईश्वर का वास केवल मनुष्यों में ही नहीं, अपितु समस्त चराचर जगत में है।
कामो इच्छा / कामना सृष्टि की उत्पत्ति का मूल कारण, यदि वह धर्म सम्मत हो, तो वह ईश्वर है।
अस्मि मैं हूँ भगवान स्वयं को समस्त शक्तियों और धर्म सम्मत इच्छाओं का अधिष्ठान बताते हैं।
भरतर्षभ हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ (अर्जुन) यह संबोधन अर्जुन की पात्रता और उनके कुल की गौरवशाली परंपरा को दर्शाता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में उस समय उच्चारित हुआ जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें 'विभूतियोग' के माध्यम से यह समझाया कि इस संसार में जो कुछ भी उत्कृष्ट, शक्तिशाली और धर्म के अनुकूल है, वह सब उन्हीं की विभूति है। महाभारत के संदर्भ में, यह श्लोक अर्जुन को यह बोध कराता है कि उनका युद्ध करना 'अधर्म' नहीं है, क्योंकि यह युद्ध धर्म की स्थापना के लिए है।

पौराणिक ग्रंथों में, विशेषकर उपनिषदों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि परमात्मा ही समस्त शक्तियों का मूल स्रोत है। केनोपनिषद में भी देवताओं के अहंकार को तोड़ने के लिए यक्ष के रूप में ब्रह्म का आगमन होता है, जो यह सिद्ध करता है कि देवताओं की शक्ति भी ब्रह्म से ही प्राप्त है। इसी प्रकार, गीता का यह श्लोक 'बल' और 'काम' (इच्छा) के आध्यात्मिक स्वरूप को परिभाषित करता है। 'काम' को सामान्यतः संसार में बंधन का कारण माना जाता है, परंतु यहाँ भगवान ने 'धर्माविरुद्ध' (धर्म के अनुकूल) कामना को अपना स्वरूप बताकर यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि इच्छाएं सात्विक हों, तो वे मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि शक्ति का उपयोग केवल दूसरों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए। भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन को संबोधित करते हुए, भगवान उन्हें उनके क्षत्रिय धर्म का स्मरण कराते हैं, जो कि धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि धर्म का रक्षक है। यह ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भ हमें यह समझने में मदद करता है कि आध्यात्मिक जीवन और व्यावहारिक जीवन में कोई विरोध नहीं है, यदि हमारा दृष्टिकोण धर्म सम्मत हो।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • आत्म-नियंत्रण में वृद्धि: इस श्लोक का निरंतर चिंतन करने से व्यक्ति अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण पाने में सक्षम होता है।
  • अहंकार का नाश: यह बोध कि 'बल' ईश्वर का है, मनुष्य के भीतर से 'मैं' और 'मेरा' के अहंकार को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है।
  • मानसिक शांति: धर्म के अनुकूल कार्य करने से मन में द्वंद्व समाप्त होता है, जिससे मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: श्लोक के अर्थ को जीवन में उतारने से व्यक्ति के चारों ओर एक सात्विक और सकारात्मक आभा (Aura) का निर्माण होता है।
  • कर्म शुद्धि: जब हम यह जानते हैं कि हमारी कामनाएं ईश्वर का रूप हैं, तो हम केवल धर्म सम्मत कार्य ही करते हैं, जिससे कर्मों का शुद्धिकरण होता है।
  • निर्णय लेने की क्षमता: धर्म और अधर्म के बीच का सूक्ष्म अंतर समझने की बुद्धि विकसित होती है, जिससे जीवन के कठिन निर्णयों में स्पष्टता आती है।
  • दैवीय अनुकंपा: भगवान की विभूतियों का स्मरण करने से साधक को ईश्वर की कृपा और मार्गदर्शन का अनुभव होता है।
  • भय से मुक्ति: जब व्यक्ति यह जान लेता है कि शक्ति का स्रोत ईश्वर है, तो वह किसी भी विपरीत परिस्थिति में निर्भय होकर धर्म का पालन करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' (Editorially Curated Content) है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय (विभूतियोग) के प्रामाणिक श्लोकों, शंकराचार्य भाष्य और विभिन्न वैष्णव आचार्यों की टीकाओं के आधार पर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल और बोधगम्य भाषा में प्रस्तुत करना है। सभी संदर्भ गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों से प्रेरित हैं, ताकि पाठकों को शुद्ध और त्रुटिहीन आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, गीता के अनुसार 'धर्माविरुद्ध' इच्छाएं ईश्वर का ही रूप हैं। यदि आपकी इच्छाएं धर्म, नैतिकता और परोपकार के दायरे में हैं, तो वे गलत नहीं हैं।

इसका अर्थ है—ऐसी शक्ति जो आसक्ति (Attachment) और राग-द्वेष से मुक्त हो। उदाहरण के लिए, एक योद्धा जब युद्ध करता है, तो वह व्यक्तिगत द्वेष के बिना, केवल अपने कर्तव्य (धर्म) के लिए लड़ता है, यही 'कामरागविवर्जितम्' बल है।

अपने दैनिक कार्यों में यह स्मरण रखें कि आपकी शक्ति आपकी अपनी नहीं है। हर कार्य करते समय यह विचार करें कि क्या यह कार्य धर्म के अनुकूल है। यदि है, तो उसे ईश्वर की सेवा समझकर करें।

यद्यपि यह अर्जुन को संबोधित है, किंतु गीता का संदेश सार्वभौमिक है। यह प्रत्येक उस साधक के लिए है जो अपने जीवन में धर्म और शक्ति के बीच संतुलन बनाना चाहता है।

ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) का समय आध्यात्मिक साधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है। हालांकि, श्रद्धा और भक्ति के साथ किसी भी समय किया गया पाठ फलदायी होता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का वह बल हूँ जो कामना और आसक्ति से रहित है। तथा प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम (इच्छा) मैं हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सद्गुणों और शुभ प्रवृत्तियों का आधार है। बल और इच्छा भी यदि सात्त्विक और धर्मसम्मत हों तो वे ईश्वरीय अंश हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 11 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 11/30 37% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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