श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 12

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 22 मिनट का पठन 150 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

20 पद
ये
जो
च
और
एव
ही
सात्त्विका
सात्त्विक
भावाः
भाव
राजसा
राजस
तामसा
तामस
च
और
ये
जो
मत्तः
मुझसे
एव
ही
इति
इस प्रकार
तान्
उनको
विद्धि
जान
न
नहीं
तु
तो
अहम्
मैं
तेषु
उनमें
ते
वे
मयि
मुझमें।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं – वे सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं, ऐसा तू जान। परन्तु मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के मूल आधार 'श्रीमद्भगवद्गीता' के सातवें अध्याय का यह बारहवां श्लोक संपूर्ण सृष्टि के संचालन के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य को उद्घाटित करता है। जब हम इस संसार को देखते हैं, तो हमें विविध प्रकार के स्वभाव, प्रवृत्तियाँ और गुण दिखाई देते हैं। कोई व्यक्ति सात्त्विक है, कोई राजसी है, तो कोई तामसी। सामान्य दृष्टि में ये गुण हमें स्वतंत्र प्रतीत होते हैं, परंतु भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि ये तीनों गुण—सत्त्व, रज और तम—परमात्मा की ही शक्ति से उत्पन्न हैं।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक 'माया' के स्वरूप को समझने की कुंजी है। माया के तीन गुण ही इस संसार के निर्माता हैं, लेकिन स्वयं ईश्वर इन गुणों से परे (निर्गुण) हैं। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हम जिस भी भाव या गुण का अनुभव कर रहे हैं, उसका मूल स्रोत परमात्मा ही है। यह बोध साधक को अहंकार से मुक्ति दिलाता है। जब हम यह समझ लेते हैं कि हमारे भीतर का सात्त्विक भाव भी ईश्वर की कृपा है, तो हम स्वयं को कर्ता मानना छोड़ देते हैं। यह श्लोक केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन जीने का वह दर्शन है जो हमें द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाता है। ब्रह्मांड की प्रत्येक क्रिया, चाहे वह प्रकाश हो (सत्त्व), गति हो (रज), या जड़ता हो (तम), सब उसी एक परम सत्ता के अधीन है। इस सत्य को आत्मसात करना ही मोक्ष का प्रथम सोपान है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥


अर्थ: जो भी सात्त्विक, राजसी और तामसी भाव हैं, उन सबको तुम मुझसे ही उत्पन्न हुए जानो। परंतु वास्तव में मैं उनमें नहीं हूँ और वे मुझमें नहीं हैं।

इस श्लोक के पाठ की विधि अत्यंत सरल किंतु प्रभावशाली है। प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के पश्चात, शुद्ध वस्त्र धारण कर भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह या गीता ग्रंथ के समक्ष बैठकर इसका पाठ करना चाहिए। पाठ से पूर्व 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का 11 बार जप करें। तत्पश्चात इस श्लोक का 108 बार मानसिक जप करने से साधक के भीतर सात्त्विक गुणों का उदय होता है और मानसिक विकारों का शमन होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
येजोसृष्टि में दृश्यमान समस्त पदार्थ।
चैवऔर भीसमस्त चराचर जगत का समावेश।
सात्त्विकासत्त्व गुण युक्तप्रकाश, ज्ञान, सुख और शांति का प्रतीक।
भावाभाव/पदार्थसंसार की समस्त प्रवृत्तियाँ और वस्तुएँ।
राजसारजोगुण युक्तकाम, वासना, कर्म और चंचलता।
तामसातमोगुण युक्तअज्ञान, आलस्य, प्रमाद और अंधकार।
मत्त एवमुझसे हीपरमात्मा ही समस्त गुणों के मूल आधार हैं।
इति तान्विद्धिऐसा तुम जानोयह ज्ञान ही अज्ञान का नाश करने वाला है।
न त्वहं तेषुमैं उनमें नहींईश्वर गुणों के अधीन नहीं, वे निर्गुण हैं।
ते मयिवे मुझमेंगुण ईश्वर पर आश्रित हैं, ईश्वर गुणों पर नहीं।

यहाँ दार्शनिक भाव यह है कि जैसे सूर्य के प्रकाश में सब कुछ दिखाई देता है, परंतु सूर्य स्वयं प्रकाश के अधीन नहीं है, वैसे ही ईश्वर की सत्ता से ये तीनों गुण कार्य करते हैं, किंतु ईश्वर इन गुणों के बंधन से पूर्णतः मुक्त हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। जब अर्जुन विषाद में डूबकर यह सोचने लगे कि संसार के विभिन्न स्वभावों के पीछे क्या कारण है, तब भगवान ने उन्हें 'ज्ञान-विज्ञान योग' के माध्यम से सृष्टि की रचना का रहस्य समझाया। पौराणिक संदर्भों में, सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति तीन गुणों से बनी है। भगवान यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि प्रकृति (माया) मेरी शक्ति है, लेकिन मैं उस शक्ति का स्वामी हूँ।

वेदों में भी 'पुरुष सूक्त' के माध्यम से इसी सत्य को प्रतिपादित किया गया है कि परमात्मा ही सब कुछ है, फिर भी वे सब कुछ से परे हैं। रामायण में भी जब प्रभु श्रीराम ने विभीषण को समझाया, तो उन्होंने इसी 'त्रिगुणातीत' स्थिति का वर्णन किया। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जिस प्रकार एक चित्रकार चित्र बनाता है, लेकिन वह स्वयं चित्र के भीतर कैद नहीं होता, उसी प्रकार परमात्मा इस संसार रूपी चित्र के रचयिता हैं, किंतु वे स्वयं इस माया के जाल से सर्वथा मुक्त हैं। यह ज्ञान साधक को संसार के सुख-दुख के द्वंद्व से ऊपर उठाकर 'स्थितप्रज्ञ' बनाने में सहायक है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्थिरता: गुणों के रहस्य को समझने से मन में उठने वाले व्यर्थ के द्वंद्व शांत होते हैं।
  • अहंकार का नाश: यह बोध कि सब कुछ ईश्वर से है, साधक के भीतर से 'मैं' और 'मेरा' का भाव मिटा देता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: इस श्लोक का नित्य पाठ करने से सात्त्विक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे नकारात्मक विचार दूर होते हैं।
  • कर्मिक शुद्धि: भगवान को कर्ता मानने से साधक कर्मों के फल से मुक्त होने लगता है।
  • दैवीय कृपा: निरंतर जप से साधक को ईश्वर के निर्गुण स्वरूप का अनुभव होने लगता है।
  • भय से मुक्ति: संसार की नश्वरता और ईश्वर की शाश्वतता का ज्ञान होने पर मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: ध्यान के समय इस श्लोक का चिंतन मन को विषय-वासनाओं से हटाकर परमात्मा में लगाता है।
  • विवेक जागृति: यह श्लोक साधक को सही और गलत के बीच भेद करने की दिव्य दृष्टि प्रदान करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय के श्लोक 12 पर आधारित है। इसे गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों और शंकराचार्य कृत गीता भाष्य के संदर्भों को आधार मानकर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के सार से जोड़ना है। यह सामग्री आध्यात्मिक शोध और शास्त्रीय व्याख्याओं का एक समन्वित रूप है, जो किसी भी साधक के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, भगवान गुणों के अधीन नहीं हैं। वे त्रिगुणातीत हैं। गुण उनकी माया के अंतर्गत आते हैं, वे स्वयं गुणों से परे हैं।

सात्त्विक भाव प्रकाश और ज्ञान का, राजसी भाव कर्म और इच्छा का, तथा तामसी भाव अज्ञान और आलस्य का प्रतीक है। ये तीनों ही भगवान की शक्ति से संचालित हैं।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम किसी भी परिस्थिति में विचलित न हों, क्योंकि सब कुछ ईश्वर की इच्छा से हो रहा है। यह हमें समभाव में रहना सिखाता है।

हाँ, श्लोक स्पष्ट कहता है कि 'ये चैव' (जो भी) भाव हैं, वे सब मुझसे ही हैं। सृष्टि के संतुलन के लिए तीनों गुणों की आवश्यकता है, अतः वे ईश्वर की ही अभिव्यक्ति हैं।

मोक्ष का अर्थ है गुणों के बंधन से मुक्ति। जब हम यह जान लेते हैं कि हम इन गुणों से परे आत्मा हैं, तो हम स्वतः ही मुक्त हो जाते हैं। यह ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं – ऐसा जानो। परन्तु मैं उनमें (आसक्त) नहीं हूँ; वे (गुण) मुझमें हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर गुणातीत है। सभी गुण उसकी शक्ति से प्रकट होते हैं, परन्तु वह स्वयं उनसे परे है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 12 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 12/30 40% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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