श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 13

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 22 मिनट का पठन 145 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
त्रिभिः
तीनों
गुणमयैः
गुणों से बने
भावैः
भावों द्वारा
एभिः
इन
सर्वम्
सम्पूर्ण
इदम्
यह
जगत्
जगत
मोहितम्
मोहित
न
नहीं
अभिजानाति
जानता
माम्
मुझे
एभ्यः
इनसे
परम्
परे
अव्ययम्
अविनाशी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इन तीनों गुणों से बने हुए भावों से सम्पूर्ण जगत मोहित है, इसलिए इन गुणों से परे तथा अविनाशी मुझे नहीं जानता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम अध्याय का यह तेरहवाँ श्लोक मानव चेतना के उस सबसे गहरे रहस्य को उद्घाटित करता है, जो जीव को जन्म-मरण के चक्र में बांधे रखता है। 'त्रिभिर्गुणमयैर्भावैः'—अर्थात सत्व, रज और तम, इन तीन गुणों के मायाजाल से निर्मित यह संपूर्ण जगत एक ऐसे आवरण की भांति है, जो आत्मा को परमात्मा के वास्तविक स्वरूप से ओझल कर देता है। वैदिक दर्शन के अनुसार, यह माया भगवान की 'दैवी' शक्ति है, जो इतनी मोहक है कि बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी इसमें उलझकर रह जाता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें यह स्मरण कराता है कि हम जो कुछ भी अपनी इंद्रियों से देखते हैं, वह केवल गुणों का खेल है। जब तक जीव इन गुणों के प्रभाव से ऊपर नहीं उठता, तब तक वह उस 'परमव्यय' तत्व को नहीं देख पाता, जो इन गुणों का आधार है, किंतु स्वयं इन गुणों से परे है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक सूत्र नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है—एक जागृति का आह्वान है। यह हमें सिखाता है कि संसार की नश्वरता को समझकर उस शाश्वत सत्य की खोज कैसे की जाए। इस श्लोक का चिंतन करने से साधक के भीतर वैराग्य का उदय होता है और वह भौतिक सुख-दुख के द्वंद्वों से मुक्त होकर आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं, किंतु वे गुणों के पर्दे के पीछे छिपे हैं, और उन्हें पाने का एकमात्र मार्ग इन गुणों के पार जाना है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के उच्चारण पर ध्यान दें। 'त्रिभिर्गुणमयैर्भावैः' का उच्चारण करते समय अनुस्वार और विसर्ग की शुद्धता का ध्यान रखें। इसे शांत चित्त होकर, पद्मासन में बैठकर, भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप का ध्यान करते हुए तीन बार जपना चाहिए। यह श्लोक मन की चंचलता को शांत करने और बुद्धि को सूक्ष्म बनाने में अत्यंत सहायक है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
त्रिभिःतीनसत्व, रज और तम - प्रकृति के तीन आधारभूत तत्व।
गुणमयैःगुणों से युक्तजो गुणों के प्रभाव से निर्मित और संचालित है।
भावैःविकारों/पदार्थोंसंसार की समस्त वस्तुएं जो गुणों के मिश्रण से बनी हैं।
एभिःइनके द्वाराइन गुणों के प्रभाव के कारण।
सर्वमिदंयह सबसंपूर्ण दृश्य जगत और भौतिक ब्रह्मांड।
जगत्संसारजो निरंतर गतिशील है और परिवर्तनशील है।
मोहितंमोहित/ठगा हुआअज्ञानता के कारण सत्य को न देख पाना।
नाभिजानातिनहीं जानतापरमात्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध न होना।
माम्मुझे (श्रीकृष्ण)परमेश्वर, जो गुणों से परे और शाश्वत हैं।
परमव्ययम्अविनाशी/सर्वोच्चजो कभी नष्ट नहीं होता और गुणों से परे है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय, 'ज्ञान-विज्ञान योग' का हिस्सा है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, जब अर्जुन विषाद में डूबे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यह ज्ञान दिया कि यह संसार केवल एक मायावी खेल है। पौराणिक संदर्भों में, इस माया को 'महामाया' कहा गया है, जो देवी दुर्गा का ही एक स्वरूप है। वेदों में इसे 'अविद्या' कहा गया है।

महाभारत के युद्ध के समय, जब अर्जुन ने देखा कि उनके अपने ही सगे-संबंधी सामने खड़े हैं, तो उनका मोह चरम पर था। तब भगवान ने उन्हें समझाया कि यह मोह इसलिए है क्योंकि तुम केवल 'गुणों' (शरीर, नाम, रूप) को देख रहे हो। यदि तुम इन गुणों के पार देख सको, तो तुम्हें केवल 'मैं' (परमात्मा) ही दिखाई दूँगा। यह श्लोक सांख्य दर्शन का सार प्रस्तुत करता है। सांख्य शास्त्र के अनुसार, प्रकृति के तीन गुण—सत्व (प्रकाश), रज (क्रिया), और तम (जड़ता)—मिलकर इस जगत की रचना करते हैं। जब तक जीव इन गुणों के अधीन है, वह 'बद्ध' है। जैसे ही वह इन गुणों के प्रभाव से मुक्त होता है, वह 'मुक्त' हो जाता है। यह शिक्षा केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए है जो आज भी भौतिक सुखों की मृगतृष्णा में भटक रही है। इस श्लोक की पृष्ठभूमि हमें यह सिखाती है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल कर्म करना नहीं, बल्कि कर्म के पीछे छिपे कर्ता (ईश्वर) को पहचानना है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्पष्टता: नियमित पाठ से बुद्धि सूक्ष्म होती है और भ्रम के बादल छंटने लगते हैं।
  • अहंकार का नाश: यह बोध होता है कि हम केवल गुणों के अधीन हैं, जिससे अहंकार स्वतः कम हो जाता है।
  • वैराग्य की प्राप्ति: संसार की नश्वरता का ज्ञान होने से अनावश्यक आसक्तियों से मुक्ति मिलती है।
  • तनाव मुक्ति: गुणों के खेल को समझने से जीवन के उतार-चढ़ाव में समभाव बना रहता है।
  • कर्म शुद्धि: जब हम जानते हैं कि सब कुछ ईश्वर का है, तो हमारे कर्म निष्काम होने लगते हैं।
  • दिव्य दृष्टि: यह श्लोक साधक को स्थूल जगत के परे सूक्ष्म सत्य को देखने की दृष्टि प्रदान करता है।
  • आध्यात्मिक ऊर्जा: निरंतर जप से ओज और तेज की वृद्धि होती है, जो सकारात्मक आभा (Aura) बनाती है।
  • मोक्ष का मार्ग: गुणों से परे जाने का अभ्यास ही अंततः जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का द्वार खोलता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्यकारों, जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के दार्शनिक दृष्टिकोणों के समन्वय से तैयार किया गया है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या पूर्णतः शास्त्रीय सिद्धांतों पर आधारित है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के सार से जोड़ना है। किसी भी आध्यात्मिक अभ्यास को शुरू करने से पहले गुरु का मार्गदर्शन और शास्त्रों का स्वाध्याय अत्यंत आवश्यक है। यह लेख केवल ज्ञानवर्धन और साधना के प्रोत्साहन हेतु है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

सत्व (शुद्धता), रज (गतिशीलता), और तम (अज्ञानता) ये तीन गुण हैं। ये हमारे स्वभाव, आहार, और विचारों को नियंत्रित करते हैं। जब हम इनके प्रभाव में होते हैं, तो हम केवल भौतिक सुखों को ही सत्य मान बैठते हैं।

'परमव्यय' का अर्थ है वह जो कभी नष्ट नहीं होता (अविनाशी)। यह ईश्वर का वह स्वरूप है जो प्रकृति के गुणों से परे है और शाश्वत है।

हाँ, निरंतर भक्ति, निष्काम कर्म और आत्म-ज्ञान के माध्यम से साधक इन गुणों के प्रभाव से ऊपर उठ सकता है। इसे ही 'गुणातीत' अवस्था कहा जाता है।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब भी हम क्रोध, लोभ या मोह में फंसें, तो याद करें कि यह केवल गुणों का प्रभाव है। यह बोध हमें तुरंत शांत होने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने में मदद करता है।

नहीं, यह श्लोक प्रत्येक गृहस्थ के लिए है। संसार में रहते हुए भी, यदि व्यक्ति यह समझ ले कि सब कुछ गुणों का खेल है, तो वह संसार के बंधनों में फंसकर भी मुक्त रह सकता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से निर्मित इन भावों से यह सम्पूर्ण जगत मोहित है। इसलिए यह इन गुणों से परे और अविनाशी मुझे नहीं जान पाता।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गुणों का प्रभाव इतना प्रबल है कि जीव उनमें फँसकर परमात्मा को भूल जाता है। गुणातीत होने पर ही ईश्वर का साक्षात्कार होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 13 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 13/30 43% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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