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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 13

अध्याय 7 · श्लोक 13

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३॥

tribhir guṇa-mayair bhāvair ebhiḥ sarvam idaṃ jagat | mohitaṃ nābhijānāti mām ebhyaḥ param avyayam ||13||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

त्रिभिः: तीनों; गुणमयैः: गुणों से बने; भावैः: भावों द्वारा; एभिः: इन; सर्वम्: सम्पूर्ण; इदम्: यह; जगत्: जगत; मोहितम्: मोहित; न: नहीं; अभिजानाति: जानता; माम्: मुझे; एभ्यः: इनसे; परम्: परे; अव्ययम्: अविनाशी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इन तीनों गुणों से बने हुए भावों से सम्पूर्ण जगत मोहित है, इसलिए इन गुणों से परे तथा अविनाशी मुझे नहीं जानता।

English Translation

Deluded by these threefold modes (gunas) of nature, the whole world does not know Me, who am above them and imperishable.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

गुणों के प्रभाव से जीव ईश्वर को नहीं पहचान पाता। वह गुणों में उलझा रहता है और उनसे परे सत्य से अनभिज्ञ रहता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।