श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 14

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 22 मिनट का पठन 199 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
दैवी
दिव्य
हि
निश्चय ही
एषा
यह
गुणमयी
गुणों से बनी
मम
मेरी
माया
माया
दुरत्यया
दुस्तर
माम्
मुझको
एव
ही
ये
जो
प्रपद्यन्ते
शरण में आते हैं
मायाम्
माया को
एताम्
इस
तरन्ति
पार करते हैं
ते
वे।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यह मेरी दिव्य माया, जो गुणों से बनी है, अत्यन्त दुस्तर है। परन्तु जो मुझमें ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया - आध्यात्मिक विवेचना

आध्यात्मिक परिचय एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का चौदहवां श्लोक संपूर्ण वेदांत दर्शन का निचोड़ है। यह श्लोक हमें उस 'माया' के स्वरूप से परिचित कराता है, जो इस दृश्य जगत का आधार है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि यह संसार एक त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) आवरण से ढका हुआ है, जिसे पार करना सामान्य जीव के लिए असंभव सा प्रतीत होता है। माया का अर्थ यहाँ केवल भ्रम नहीं, बल्कि ईश्वर की वह रचनात्मक शक्ति है जो आत्मा को परमात्मा से विलग होने का आभास कराती है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से, यह श्लोक 'शरणागति' (Surrender) के सिद्धांत को स्थापित करता है। जब तक मनुष्य अपने अहंकार और भौतिक उपलब्धियों के बल पर इस माया को पार करने का प्रयास करता है, वह और अधिक उलझता जाता है। माया का यह चक्र जन्म-मरण की श्रृंखला को निरंतर बनाए रखता है। इस श्लोक का महत्व इस बात में निहित है कि यह एक 'सुगम मार्ग' (Easy Path) प्रदान करता है—'मामेव ये प्रपद्यन्ते'। अर्थात, जो जीव पूर्ण निष्ठा के साथ भगवान की शरण में आता है, उसके लिए माया का यह दुर्गम सागर एक छोटे से गड्ढे के समान हो जाता है। यह श्लोक न केवल दार्शनिक है, बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक औषधि भी है, जो मनुष्य को उसके अस्तित्व के संकट से उबारकर शाश्वत शांति की ओर ले जाती है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह माया ही वह शक्ति है जो परमात्मा की इच्छा को भौतिक रूप में प्रकट करती है, और इस श्लोक का चिंतन हमें उस मूल स्रोत से पुनः जोड़ने का कार्य करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥


अन्वय: हि एषा दैवी गुणमयी मम माया दुरत्यया, ये माम् एव प्रपद्यन्ते ते एतां मायाम् तरन्ति।

इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को एकाग्रचित्त होकर भगवान के सगुण स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। विधि के अनुसार, प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के पश्चात शुद्ध आसन पर बैठकर, मन को शांत कर इस श्लोक का 108 बार जप करने से बुद्धि में स्पष्टता और हृदय में वैराग्य का उदय होता है। यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की एक मानसिक प्रक्रिया है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
दैवीदिव्ययह माया ईश्वर की अपनी शक्ति है, कोई बाहरी वस्तु नहीं।
ह्येषानिश्चय ही यहयह माया का प्रभाव प्रत्यक्ष और निर्विवाद है।
गुणमयीत्रिगुणमयीसत्व, रज और तम गुणों से निर्मित संसार।
मममेरीमाया का स्वामी स्वयं भगवान हैं, अतः वे ही इसे हटा सकते हैं।
मायाभ्रम/शक्तिपरमात्मा के वास्तविक स्वरूप को छिपाने वाली शक्ति।
दुरत्ययाकठिनता से पार करने योग्यस्वयं के पुरुषार्थ से इसे जीतना असंभव है।
मामेवमुझको हीअनन्य भक्ति और पूर्ण समर्पण का मार्ग।
प्रपद्यन्तेशरण लेते हैंअहंकार का त्याग कर ईश्वर को सर्वस्व सौंपना।
तरन्तिपार कर जाते हैंभवसागर से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का नाम 'ज्ञान-विज्ञान योग' है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में, जब अर्जुन विषाद में डूबे हुए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यह दिव्य ज्ञान प्रदान किया। यह श्लोक उस समय आया जब अर्जुन ने पूछा कि मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है। भगवान ने उत्तर दिया कि यह जीव की अपनी शक्ति नहीं, बल्कि 'माया' का प्रभाव है।

पौराणिक संदर्भों में, माया को 'योगमाया' भी कहा गया है। श्रीमद्भागवत पुराण में भी वर्णन है कि कैसे भगवान विष्णु की माया के कारण ब्रह्मा और शिव जैसे देव भी कभी-कभी विस्मित हो जाते हैं। मार्कण्डेय ऋषि की कथा में, जब उन्होंने भगवान नारायण से माया का स्वरूप देखना चाहा, तो भगवान ने उन्हें एक प्रलयकारी जल में अकेला छोड़ दिया, जहाँ उन्होंने देखा कि कैसे माया के एक छोटे से अंश ने पूरे ब्रह्मांड को निगल लिया था। यह कथा सिद्ध करती है कि माया का विस्तार अनंत है।

महाभारत के युद्ध में भी, माया का अर्थ केवल युद्ध की रणनीति नहीं, बल्कि मोह का त्याग था। अर्जुन का मोह—अपने सगे-संबंधियों के प्रति—माया का ही एक रूप था। जब तक अर्जुन ने स्वयं को कर्ता माना, वे दुखी रहे। जैसे ही उन्होंने 'मामेव प्रपद्यन्ते' (मेरी शरण में आओ) के सिद्धांत को अपनाया, वे माया के प्रभाव से मुक्त होकर अपने कर्तव्य का पालन करने में समर्थ हुए। यह श्लोक हमें सिखाता है कि माया का नाश ज्ञान से नहीं, बल्कि भक्ति से होता है। ज्ञान तो माया का ही एक हिस्सा है, लेकिन भक्ति माया के स्वामी तक पहुँचने का सीधा मार्ग है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: इस श्लोक का नियमित चिंतन मन की चंचलता को कम करता है और चित्त को स्थिर बनाता है।
  • अहंकार का शमन: यह बोध कराता है कि हम स्वतंत्र नहीं हैं, जिससे अहंकार का नाश होता है।
  • भय से मुक्ति: जब साधक यह जान लेता है कि माया ईश्वर के अधीन है, तो उसका भविष्य का भय समाप्त हो जाता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: दैवीय शक्ति के प्रति समर्पण से साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच (Aura) निर्मित होता है।
  • कर्म शुद्धि: माया के प्रभाव से होने वाले गलत निर्णयों में कमी आती है, जिससे कर्म शुद्ध होते हैं।
  • एकाग्रता में वृद्धि: ध्यान के समय इस श्लोक का जप मन को भटकने से रोकता है।
  • वैराग्य की प्राप्ति: संसार की नश्वरता का बोध होने से अनावश्यक मोह-माया से मुक्ति मिलती है।
  • ईश्वरीय कृपा: 'प्रपद्यन्ते' का भाव ईश्वर के साथ एक अटूट संबंध स्थापित करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के मूल संस्कृत श्लोकों और आचार्य शंकर, रामानुजाचार्य एवं मधुसूदन सरस्वती के भाष्य ग्रंथों के आधार पर 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में समझाना है। इस लेख में दी गई व्याख्याएं वेदों, उपनिषदों और गीता के पारंपरिक सिद्धांतों के अनुरूप हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल एक लेख न मानकर, अपने जीवन में उतारने योग्य एक मार्गदर्शिका के रूप में देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

माया भगवान की त्रिगुणात्मक शक्ति है। यह हमें 'मैं' और 'मेरा' के भ्रम में रखती है, जिससे हम सत्य को भूलकर भौतिक सुखों में उलझ जाते हैं।

माया को समाप्त करना कठिन है, लेकिन ईश्वर की शरण में जाने से उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है। आप माया के बीच रहकर भी उससे निर्लिप्त रह सकते हैं।

शरण लेने का अर्थ है अपने सभी कर्मों, फलों और अहंकार को ईश्वर को समर्पित कर देना और यह स्वीकार करना कि वही हमारे रक्षक हैं।

नहीं, यह श्लोक गृहस्थों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संसार में रहते हुए भी ईश्वर के प्रति समर्पित भाव रखना ही इस श्लोक का मूल संदेश है।

किसी भी कठिन परिस्थिति में, यह स्मरण करें कि यह माया है और ईश्वर ही इसका समाधान हैं। यह विचार आपको तनावमुक्त रखेगा।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यह मेरी दिव्य माया, जो तीनों गुणों से बनी है, अत्यन्त दुर्गम है। परन्तु जो मनुष्य केवल मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

माया के बन्धन से छूटने का एकमात्र उपाय ईश्वर की शरणागति है। भक्ति के बिना माया को पार करना असंभव है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 14 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 14/30 47% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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