पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
यह मेरी दिव्य माया, जो गुणों से बनी है, अत्यन्त दुस्तर है। परन्तु जो मुझमें ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक परिचय एवं ब्रह्मांडीय महत्व
श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का चौदहवां श्लोक संपूर्ण वेदांत दर्शन का निचोड़ है। यह श्लोक हमें उस 'माया' के स्वरूप से परिचित कराता है, जो इस दृश्य जगत का आधार है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि यह संसार एक त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) आवरण से ढका हुआ है, जिसे पार करना सामान्य जीव के लिए असंभव सा प्रतीत होता है। माया का अर्थ यहाँ केवल भ्रम नहीं, बल्कि ईश्वर की वह रचनात्मक शक्ति है जो आत्मा को परमात्मा से विलग होने का आभास कराती है।
सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से, यह श्लोक 'शरणागति' (Surrender) के सिद्धांत को स्थापित करता है। जब तक मनुष्य अपने अहंकार और भौतिक उपलब्धियों के बल पर इस माया को पार करने का प्रयास करता है, वह और अधिक उलझता जाता है। माया का यह चक्र जन्म-मरण की श्रृंखला को निरंतर बनाए रखता है। इस श्लोक का महत्व इस बात में निहित है कि यह एक 'सुगम मार्ग' (Easy Path) प्रदान करता है—'मामेव ये प्रपद्यन्ते'। अर्थात, जो जीव पूर्ण निष्ठा के साथ भगवान की शरण में आता है, उसके लिए माया का यह दुर्गम सागर एक छोटे से गड्ढे के समान हो जाता है। यह श्लोक न केवल दार्शनिक है, बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक औषधि भी है, जो मनुष्य को उसके अस्तित्व के संकट से उबारकर शाश्वत शांति की ओर ले जाती है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह माया ही वह शक्ति है जो परमात्मा की इच्छा को भौतिक रूप में प्रकट करती है, और इस श्लोक का चिंतन हमें उस मूल स्रोत से पुनः जोड़ने का कार्य करता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥
अन्वय: हि एषा दैवी गुणमयी मम माया दुरत्यया, ये माम् एव प्रपद्यन्ते ते एतां मायाम् तरन्ति।
इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को एकाग्रचित्त होकर भगवान के सगुण स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। विधि के अनुसार, प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के पश्चात शुद्ध आसन पर बैठकर, मन को शांत कर इस श्लोक का 108 बार जप करने से बुद्धि में स्पष्टता और हृदय में वैराग्य का उदय होता है। यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की एक मानसिक प्रक्रिया है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का नाम 'ज्ञान-विज्ञान योग' है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में, जब अर्जुन विषाद में डूबे हुए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यह दिव्य ज्ञान प्रदान किया। यह श्लोक उस समय आया जब अर्जुन ने पूछा कि मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है। भगवान ने उत्तर दिया कि यह जीव की अपनी शक्ति नहीं, बल्कि 'माया' का प्रभाव है।
पौराणिक संदर्भों में, माया को 'योगमाया' भी कहा गया है। श्रीमद्भागवत पुराण में भी वर्णन है कि कैसे भगवान विष्णु की माया के कारण ब्रह्मा और शिव जैसे देव भी कभी-कभी विस्मित हो जाते हैं। मार्कण्डेय ऋषि की कथा में, जब उन्होंने भगवान नारायण से माया का स्वरूप देखना चाहा, तो भगवान ने उन्हें एक प्रलयकारी जल में अकेला छोड़ दिया, जहाँ उन्होंने देखा कि कैसे माया के एक छोटे से अंश ने पूरे ब्रह्मांड को निगल लिया था। यह कथा सिद्ध करती है कि माया का विस्तार अनंत है।
महाभारत के युद्ध में भी, माया का अर्थ केवल युद्ध की रणनीति नहीं, बल्कि मोह का त्याग था। अर्जुन का मोह—अपने सगे-संबंधियों के प्रति—माया का ही एक रूप था। जब तक अर्जुन ने स्वयं को कर्ता माना, वे दुखी रहे। जैसे ही उन्होंने 'मामेव प्रपद्यन्ते' (मेरी शरण में आओ) के सिद्धांत को अपनाया, वे माया के प्रभाव से मुक्त होकर अपने कर्तव्य का पालन करने में समर्थ हुए। यह श्लोक हमें सिखाता है कि माया का नाश ज्ञान से नहीं, बल्कि भक्ति से होता है। ज्ञान तो माया का ही एक हिस्सा है, लेकिन भक्ति माया के स्वामी तक पहुँचने का सीधा मार्ग है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के मूल संस्कृत श्लोकों और आचार्य शंकर, रामानुजाचार्य एवं मधुसूदन सरस्वती के भाष्य ग्रंथों के आधार पर 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में समझाना है। इस लेख में दी गई व्याख्याएं वेदों, उपनिषदों और गीता के पारंपरिक सिद्धांतों के अनुरूप हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल एक लेख न मानकर, अपने जीवन में उतारने योग्य एक मार्गदर्शिका के रूप में देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
यह मेरी दिव्य माया, जो तीनों गुणों से बनी है, अत्यन्त दुर्गम है। परन्तु जो मनुष्य केवल मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
माया के बन्धन से छूटने का एकमात्र उपाय ईश्वर की शरणागति है। भक्ति के बिना माया को पार करना असंभव है।