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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 14

अध्याय 7 · श्लोक 14

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४॥

daivī hy eṣā guṇa-mayī mama māyā duratyayā | mām eva ye prapadyante māyām etāṃ taranti te ||14||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

दैवी: दिव्य; हि: निश्चय ही; एषा: यह; गुणमयी: गुणों से बनी; मम: मेरी; माया: माया; दुरत्यया: दुस्तर; माम्: मुझको; एव: ही; ये: जो; प्रपद्यन्ते: शरण में आते हैं; मायाम्: माया को; एताम्: इस; तरन्ति: पार करते हैं; ते: वे।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यह मेरी दिव्य माया, जो गुणों से बनी है, अत्यन्त दुस्तर है। परन्तु जो मुझमें ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।

English Translation

This divine Maya of Mine, consisting of the gunas, is difficult to cross over. Those who take refuge in Me alone, cross over this Maya.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

माया (अज्ञान) को पार करना बहुत कठिन है, लेकिन ईश्वर की शरण में जाने से वह सरल हो जाती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।