श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 29

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 24 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
जरामरणमोक्षाय
जरा और मरण से मुक्ति के लिए
माम्
मुझे
आश्रित्य
आश्रय लेकर
यतन्ति
प्रयत्न करते हैं
ये
जो
ते
वे
ब्रह्म
ब्रह्म को
तत्
उस
विदुः
जानते हैं
कृत्स्नम्
सम्पूर्ण
अध्यात्मम्
अध्यात्म
च
और
अखिलम्
सम्पूर्ण
कर्म
कर्म को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो पुरुष जरा और मरण से मुक्ति के लिए मेरी शरण ग्रहण करके प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म और समस्त कर्म को जान लेते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम अध्याय का यह 29वां श्लोक उन साधकों के लिए एक प्रकाश-स्तंभ है, जो संसार के दुखों, विशेषकर 'जरा' (वृद्धावस्था) और 'मरण' (मृत्यु) के चक्र से मुक्ति की आकांक्षा रखते हैं। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि मोक्ष का मार्ग केवल कर्मकांड या बाह्य अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 'मामाश्रित्य' (मेरी शरण लेने) की पूर्ण शरणागति पर आधारित है। जब एक साधक अपनी समस्त अहंता को त्यागकर परमात्मा के आश्रय में आता है, तो उसे 'ब्रह्म' (परम सत्य), 'अध्यात्म' (स्वयं का स्वरूप) और 'कर्म' (सृष्टि की कार्यप्रणाली) का समग्र ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक वेदान्त का सार है। भारतीय संस्कृति में 'जरामरण' को संसार का सबसे बड़ा बंधन माना गया है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब तक हम स्वयं को कर्ता मानते हैं, तब तक हम काल के चक्र में बंधे रहते हैं। जैसे ही हम भगवान को अपना आधार बनाते हैं, हमारी चेतना का विस्तार होता है। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि एक दिव्य विज्ञान है जो मनुष्य को नश्वरता से अमरता की ओर ले जाने की विधि बताता है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह श्लोक हमें यह बोध कराता है कि संपूर्ण चराचर जगत एक ही ब्रह्म की अभिव्यक्ति है, और जो इस रहस्य को समझ लेता है, उसके लिए मृत्यु केवल एक वस्त्र परिवर्तन के समान हो जाती है। यह ज्ञान साधक को मानसिक द्वंद्वों से मुक्त कर परम शांति की स्थिति में प्रतिष्ठित करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९॥


अर्थ: जो भक्त जरा और मरण से मुक्त होने के लिए मेरी शरण लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, संपूर्ण अध्यात्म को और समस्त कर्मों के रहस्य को भली-भांति जान लेते हैं।

पाठ विधि: इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना गया है। सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह या चित्र के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। तुलसी की माला से कम से कम 108 बार इस श्लोक का मानसिक जप करें। जप के उपरांत शांत चित्त होकर भगवान के स्वरूप का ध्यान करें और यह प्रार्थना करें कि आपकी बुद्धि को 'ब्रह्म' और 'अध्यात्म' के रहस्य को समझने की शक्ति प्राप्त हो। यह अभ्यास निरंतरता के साथ करने पर साधक के भीतर एक दिव्य तेज का संचार होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
जरामरणमोक्षायबुढ़ापे और मृत्यु से मुक्ति के लिएसंसार के दुखों के मूल कारण 'काल' के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त होने की अवस्था।
मामाश्रित्यमेरी शरण लेकरअहंकार का त्याग कर पूर्ण समर्पण, जहाँ भक्त का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रहता।
यतन्तिप्रयत्न करते हैंसाधना, योग और निष्काम कर्म के माध्यम से निरंतर चलने वाला आध्यात्मिक पुरुषार्थ।
येजोवे जिज्ञासु साधक जो सत्य की खोज में समर्पित हैं।
तेवेवे भाग्यशाली भक्त जो शरणागति के मार्ग पर चल पड़े हैं।
ब्रह्मपरम सत्यवह निर्गुण-निराकार तत्व जो संपूर्ण सृष्टि का आधार है।
तद्विदुःउसको जानते हैंकेवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि अनुभवजन्य साक्षात्कार।
कृत्स्नमसंपूर्णअखंड, अविभाज्य और पूर्ण सत्य का बोध।
अध्यात्मंआत्मतत्त्वस्वयं के स्वरूप का ज्ञान, 'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति।
कर्म चाखिलम्समस्त कर्मों का रहस्यकर्म के सूक्ष्म नियमों और उनके फल के चक्र को समझने की क्षमता।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का नाम 'ज्ञान-विज्ञान योग' है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि किस प्रकार यह संसार उनकी 'परा' और 'अपरा' प्रकृति से निर्मित है। महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के बीच, जब अर्जुन मोह और विषाद से ग्रस्त थे, तब भगवान ने उन्हें यह गूढ़ ज्ञान प्रदान किया। यह श्लोक उस श्रृंखला का हिस्सा है जहाँ भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा 'अहंकार' है।

पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि ध्रुव, प्रह्लाद और नचिकेता जैसे बालकों ने भी इसी 'शरणागति' के मार्ग को अपनाया था। नचिकेता ने जब यमराज से 'जरामरण' के रहस्य को जानने की जिज्ञासा की, तो यमराज ने उसे 'आत्म-ज्ञान' का उपदेश दिया। यह श्लोक उसी उपनिषदीय परंपरा का विस्तार है। वेदों में भी 'अमृतत्व' की प्राप्ति के लिए 'ब्रह्मविद्या' को अनिवार्य माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं को उस ब्रह्म के रूप में स्थापित करते हैं, जो अर्जुन के लिए मार्गदर्शक और लक्ष्य दोनों हैं। यह श्लोक हमें यह भी याद दिलाता है कि कर्मकांड (यज्ञ, दान, तप) तब तक अपूर्ण हैं जब तक उनके पीछे 'ब्रह्म' का बोध न हो। महाभारत के युद्ध में अर्जुन का विजय होना केवल धनुष-बाण का कौशल नहीं था, बल्कि भगवान की शरण में रहकर 'कर्म' के रहस्य को समझ लेने का परिणाम था। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन के हर युद्ध में, चाहे वह आंतरिक हो या बाहरी, भगवान का आश्रय ही एकमात्र सुरक्षा कवच है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मृत्यु का भय समाप्त होना: इस श्लोक के निरंतर चिंतन से साधक को यह बोध होता है कि आत्मा अजर-अमर है, जिससे मृत्यु का स्वाभाविक भय समाप्त हो जाता है।
  • मानसिक स्थिरता: जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी मन विचलित नहीं होता, क्योंकि साधक का आश्रय 'परमात्मा' बन जाता है।
  • कर्मों की शुद्धि: 'कर्म चाखिलम्' के रहस्य को समझने से व्यक्ति निष्काम कर्म की ओर अग्रसर होता है, जिससे नए कर्म-बंधनों का निर्माण रुक जाता है।
  • आत्म-साक्षात्कार: स्वयं के स्वरूप का ज्ञान होने से हीन भावना और अहंकार दोनों का नाश होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह: श्लोक के दिव्य स्पंदन साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच (Aura) का निर्माण करते हैं।
  • एकाग्रता में वृद्धि: ध्यान की गहराई बढ़ती है, जिससे सांसारिक कार्यों में भी दक्षता आती है।
  • दैवीय कृपा की प्राप्ति: शरणागति के भाव से भगवान की कृपा का अनुभव साधक को हर क्षण होने लगता है।
  • अध्यात्मिक जिज्ञासा का शमन: जीवन के कठिन प्रश्नों के उत्तर स्वयं के भीतर से मिलने लगते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' (Editorially Curated Content) के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों और भाष्यकारों (जैसे आदि शंकराचार्य और स्वामी रामसुखदास जी) के दृष्टिकोणों के आधार पर तैयार की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदान्त के गूढ़ सिद्धांतों को सरल और सुबोध भाषा में प्रस्तुत करना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि आत्म-चिंतन और शास्त्र-अध्ययन को प्रोत्साहित करता है। सभी संदर्भ श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय के प्रामाणिक संस्करणों से लिए गए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इसका अर्थ शारीरिक अमरता नहीं, बल्कि उस अवस्था की प्राप्ति है जहाँ आत्मा को जन्म-मरण के चक्र (संसार) से मुक्ति मिल जाती है। यह मोक्ष की स्थिति है।

भगवान की शरण लेने का अर्थ है अपने अहंकार को त्यागकर उनके विधान को स्वीकार करना और अपने समस्त कर्मों को उन्हें समर्पित कर देना।

जी हाँ, यह श्लोक विशेष रूप से गृहस्थों के लिए है, ताकि वे संसार में रहते हुए भी अनासक्त भाव से अपना कर्तव्य पालन कर सकें।

ब्रह्म वह परम सत्य है जो सृष्टि का आधार है, जबकि अध्यात्म वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम स्वयं को उस ब्रह्म से जोड़ते हैं।

नियमित पाठ से बुद्धि निर्मल होती है, सांसारिक मोह कम होता है और साधक को जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध होता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो पुरुष बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्ति के लिए मेरा आश्रय लेकर साधना करते हैं, वे उस परब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म (आत्मविद्या) और समस्त कर्म (उनके रहस्य) को जान लेते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्ति के मार्ग पर चलकर मोक्ष की इच्छा रखने वाले साधक ब्रह्मज्ञान और कर्म के गूढ़ तत्त्व को समझ लेते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 29 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 29/30 97% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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