पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
8 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हे भरतवंशी! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह के कारण समस्त प्राणी जन्म लेते ही मोह को प्राप्त हो जाते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व
श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का यह सत्ताइसवाँ श्लोक मानव चेतना के सबसे गहरे और जटिल रहस्यों को उद्घाटित करता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए उस मूल कारण को स्पष्ट करते हैं, जिसके कारण जीव इस भौतिक संसार के चक्र में फंसा रहता है। 'इच्छा' और 'द्वेष'—ये दो ऐसी शक्तियां हैं जो आत्मा के शुद्ध स्वरूप को ढंक लेती हैं। जब हम जन्म लेते हैं, तो हम एक कोरे कागज की तरह नहीं होते, बल्कि हमारे पूर्व जन्मों के संस्कारों की एक लंबी श्रृंखला हमारे साथ होती है। ये संस्कार ही 'इच्छा' (राग) और 'द्वेष' (घृणा) के रूप में प्रकट होते हैं।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमारी अधिकांश समस्याएं बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक हैं। हम जिसे 'संसार' कहते हैं, वह वास्तव में हमारे मन की द्वैतवादी (Duality) धारणाओं का प्रतिबिंब है। जब तक जीव सुख-दुख, लाभ-हानि, और मान-अपमान के द्वंद्वों में उलझा रहता है, तब तक उसे उस परम सत्य (ब्रह्म) का साक्षात्कार नहीं हो सकता। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं है, बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक सूत्र है जो हमें यह बताता है कि कैसे हम अपनी चेतना को इन द्वंद्वों से ऊपर उठा सकते हैं। ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हम सभी एक ही परमात्मा के अंश हैं, परंतु 'मोह' की चादर ने हमें एक-दूसरे से और अपने मूल स्रोत से अलग कर दिया है। इस श्लोक का चिंतन करना स्वयं के भीतर की उन परतों को हटाने का प्रयास है जो हमें ईश्वर से दूर रखती हैं। यह ज्ञान हमें अहंकार के उस जाल से बाहर निकलने का मार्ग दिखाता है, जो अज्ञानता के कारण उत्पन्न होता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७॥
उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के स्पष्ट उच्चारण पर ध्यान दें। 'इच्छाद्वेष' को एक साथ लयबद्ध तरीके से पढ़ें। 'परन्तप' शब्द का उच्चारण करते समय 'प' पर बल दें, क्योंकि यह अर्जुन को संबोधित करते हुए उनकी वीरता और संयम की याद दिलाता है। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात, शांत चित्त होकर इस श्लोक का तीन बार पाठ करने से मन की एकाग्रता में वृद्धि होती है और द्वैत भाव कम होने लगता है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का शीर्षक 'ज्ञानविज्ञानयोग' है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि ज्ञान क्या है और विज्ञान क्या है। यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में बोला गया था, जहाँ अर्जुन अपने सगे-संबंधियों को देखकर मोहग्रस्त हो गए थे। यह मोह केवल एक क्षणिक भाव नहीं था, बल्कि यह 'इच्छा' (विजय की इच्छा) और 'द्वेष' (दुर्योधन के प्रति क्रोध) का एक जटिल मिश्रण था।
पौराणिक संदर्भ में, हम देखते हैं कि कैसे महर्षि व्यास ने महाभारत के माध्यम से यह समझाया है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसके भीतर ही है। जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'परन्तप' कहकर संबोधित करते हैं, तो वे उन्हें उनके क्षत्रिय धर्म की याद दिलाते हैं। क्षत्रिय का अर्थ केवल युद्ध करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अज्ञान को जीतना भी है। वेदों में भी 'द्वैत' को अज्ञान का मूल माना गया है। उपनिषदों में कहा गया है कि 'द्वितीयाद् वै भयं भवति'—अर्थात, जब तक दूसरा (द्वैत) है, तब तक भय बना रहेगा। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है, तब इच्छा और द्वेष का नाश हो जाता है।
महाभारत के युद्ध में अर्जुन का मोह इसी द्वंद्व का परिणाम था। वह धर्म और अधर्म के बीच, अपने और पराये के बीच, और कर्तव्य और भावना के बीच झूल रहे थे। यह श्लोक हमें सिखाता है कि संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक जीव इसी द्वंद्व के चक्र में फंसता है। यह कोई नई बात नहीं है, यह सृष्टि का नियम है। लेकिन जो इस नियम को समझ लेता है, वह इस चक्र से मुक्त होने का मार्ग भी खोज लेता है। यह श्लोक हमें यह बोध कराता है कि हमारी वर्तमान स्थिति हमारे पूर्व के कर्मों और संस्कारों का परिणाम है, और इससे बाहर निकलने का एकमात्र उपाय 'समत्व' (Equanimity) है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह विश्लेषण श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों, आदि शंकराचार्य के भाष्य और स्वामी विवेकानंद के दार्शनिक व्याख्यानों के आधार पर संकलित किया गया है। यहाँ प्रस्तुत अर्थ पूर्णतः शास्त्रीय परंपराओं के अनुरूप है। हमारा उद्देश्य पाठकों को केवल शब्दार्थ न देकर, उस गूढ़ आध्यात्मिक सत्य से परिचित कराना है जो गीता के प्रत्येक श्लोक में निहित है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, अपितु आत्म-चिंतन और विवेकपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे भरतवंशी! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वों (जैसे सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी) के मोह के कारण समस्त प्राणी जन्म लेते ही मोह को प्राप्त हो जाते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
राग-द्वेष ही संसार के बन्धन का कारण हैं। इनसे ऊपर उठकर ही सत्य का साक्षात्कार संभव है।