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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 27

अध्याय 7 · श्लोक 27

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७॥

icchā-dveṣa-samutthena dvandva-mohena bhārata | sarva-bhūtāni sammohaṃ sarge yānti parantapa ||27||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

इच्छाद्वेषसमुत्थेन: इच्छा और द्वेष से उत्पन्न; द्वन्द्वमोहेन: द्वन्द्वमोह (द्वन्द्वों के मोह) से; भारत: हे भरतवंशी; सर्वभूतानि: समस्त प्राणी; सम्मोहम्: मोह को; सर्गे: जन्म लेते ही; यान्ति: प्राप्त होते हैं; परन्तप: हे परन्तप (शत्रुतापन)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे भरतवंशी! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह के कारण समस्त प्राणी जन्म लेते ही मोह को प्राप्त हो जाते हैं।

English Translation

O Bharata (Arjuna), all beings are born into delusion, O conqueror of foes, overcome by the delusion of duality arising from desire and aversion.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

संसार में जन्म लेते ही जीव राग-द्वेष के वशीभूत हो जाता है, जिससे वह सत्य से विमुख हो जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।