श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 26

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 41 मिनट का पठन 133 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
वेद
जानता हूँ
अहम्
मैं
समतीतानि
बीते हुए
वर्तमानानि
वर्तमान
च
और
अर्जुन
हे अर्जुन
भविष्याणि
भविष्य में होने वाले
च
भी
भूतानि
सब प्राणियों को
माम्
मुझे
तु
तो
वेद
जानता है
न
नहीं
कश्चन
कोई भी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे अर्जुन! मैं समस्त प्राणियों को, जो बीत चुके हैं, वर्तमान में हैं और भविष्य में होंगे, जानता हूँ। परन्तु मुझे कोई नहीं जानता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

"वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥"

ज्ञानविज्ञानयोग — परमेश्वर की सर्वज्ञता और माया का रहस्य

१. दिव्य परिचय एवं ब्रह्मांडीय महत्व (Introduction & Cosmic Significance)

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय 'ज्ञानविज्ञानयोग' का यह २६वाँ श्लोक सनातन धर्म के दार्शनिक चिंतन का एक अत्यंत दीप्तिमान शिखर है। इस श्लोक में जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानव जाति को अपनी असीम, अनादि और अनंत सत्ता का परिचय दे रहे हैं। यहाँ भगवान अपनी 'सर्वज्ञता' (Omniscience) और मनुष्य की 'अल्पज्ञता' (Limited Knowledge) के बीच के उस सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हैं, जो जीव को ईश्वर से पृथक करता है। भौतिक जगत में रहने वाला प्रत्येक जीव समय (काल) की सीमाओं में बंधा हुआ है। हम केवल वर्तमान के एक अत्यंत सूक्ष्म अंश को देख पाते हैं, अतीत हमारी स्मृति की धुंधली परतों में खो जाता है और भविष्य हमारे लिए पूर्णतः अनिश्चित और अदृश्य रहता है।

इसके विपरीत, योगेश्वर श्रीकृष्ण स्पष्ट घोषणा करते हैं कि वे काल के तीनों आयामों—भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल—से परे हैं। वे न केवल इन तीनों कालों में घटित होने वाली घटनाओं के साक्षी हैं, बल्कि वे ही इन कालों के नियंता भी हैं। इस श्लोक का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह हमें हमारी सीमाओं का बोध कराता है और साथ ही उस परम सत्ता के प्रति पूर्ण शरणागति (Surrender) का मार्ग प्रशस्त करता है जो सब कुछ जानने वाली है। जब साधक इस सत्य को हृदयंगम कर लेता है कि उसका आराध्य उसके भूत, वर्तमान और भविष्य का एकमात्र ज्ञाता और रक्षक है, तो उसके भीतर से अनिश्चितता का भय समूल नष्ट हो जाता है। यह श्लोक अद्वैत वेदांत और विशिष्टाद्वैत दोनों ही दर्शनों में माया के आवरण को समझने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र के रूप में स्वीकार किया गया है।

२. संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं उच्चारण विधि

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६॥

संस्कृत रोमन लिपि (Transliteration):

vedāhaṁ samatītāni vartamānāni cārjuna |
bhaviṣyāṇi ca bhūtāni māṁ tu veda na kaścana || 26 ||

सस्वर पाठ एवं उच्चारण निर्देश:

इस श्लोक का पाठ अनुष्टुप छंद में किया जाता है। प्रथम चरण "वेदाहं समतीतानि" का उच्चारण करते समय 'वेदाहम्' पर बल दें। द्वितीय चरण "वर्तमानानि चार्जुन" में 'चार्जुन' का संधि-विच्छेद 'च + अर्जुन' के रूप में समझें। तृतीय चरण "भविष्याणि च भूतानि" में 'भविष्याणि' के 'ष' का उच्चारण मूर्धन्य रूप से करें। चतुर्थ चरण "मां तु वेद न कश्चन" में 'मां' के अनुस्वार को नासिका से स्पष्ट उच्चारित करें। इस प्रकार लयबद्ध पाठ करने से अंतःकरण में सात्विक तरंगों का संचार होता है।

३. पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

भगवान श्रीकृष्ण के इस दिव्य संदेश के प्रत्येक शब्द में ज्ञान का एक अगाध सागर छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का व्याकरण सम्मत सरल अर्थ और उसका गहरा दार्शनिक निहितार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द (Sanskrit Word) सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Philosophical Interpretation)
वेदाहम् (Veda + Aham) मैं भली-भांति जानता हूँ यहाँ 'अहम्' परब्रह्म परमेश्वर का सूचक है। भगवान अपनी पूर्णता और सर्वज्ञता को प्रकट करते हुए कहते हैं कि उनके ज्ञान में कभी कोई संकोच या सीमा नहीं होती। वे सब कुछ प्रत्यक्ष देखते हैं।
समतीतानि (Samatītāni) अतीत में बीते हुए को जो कुछ भी भूतकाल में घटित हो चुका है, चाहे वह अरबों वर्ष पूर्व की सृष्टि का सृजन हो या किसी जीव का पूर्व जन्म, वह सब भगवान की स्मृति में वर्तमान की भांति अंकित है।
वर्तमानानि (Vartamānāni) वर्तमान काल के जीवों/घटनाओं को इस समय ब्रह्मांड के अनंत कोटि ब्रह्मांडों में जो कुछ भी घटित हो रहा है, प्रत्येक जीव के मन में उठने वाले विचार और उनकी चेष्टाएं, उन सब से भगवान प्रतिपल अवगत हैं।
च (Ca) और (And) यह अव्यय तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) को एक अटूट सूत्र में जोड़ने का कार्य करता है, जो दर्शाता है कि भगवान के लिए काल खंडित नहीं है।
अर्जुन (Arjuna) हे अर्जुन! अर्जुन का अर्थ है 'ऋजु' यानी सरल और निष्पाप। भगवान अपने प्रिय सखा और निष्पाप भक्त को संबोधित कर रहे हैं, क्योंकि केवल सरल हृदय ही इस परम ज्ञान को ग्रहण कर सकता है।
भविष्याणि (Bhaviṣyāṇi) भविष्य में होने वाले को आने वाले समय में जो कुछ भी घटित होने वाला है, जीवों के आगामी जन्म, उनके कर्मों के फल और सृष्टि का प्रलय—यह सब भगवान के संकल्प के अधीन पहले से ही निश्चित और उनके द्वारा ज्ञात है।
भूतानि (Bhūtāni) समस्त चराचर प्राणियों को इसमें केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि देव, दानव, यक्ष, पशु-पक्षी, कीट-पतंग और वृक्ष आदि सभी ८४ लाख योनियों के जीव सम्मिलित हैं। भगवान प्रत्येक जीव के अस्तित्व से परिचित हैं।
माम् (Mām) मुझको (परमेश्वर को) भगवान के उस सच्चिदानंद, गुणातीत, दिव्य और वास्तविक स्वरूप को, जो माया के आवरण से परे है।
तु (Tu) किन्तु / परन्तु (But) यह शब्द एक महान रहस्योद्घाटन की ओर संकेत करता है। यह जीव और ईश्वर के बीच के उस विशाल अंतर को रेखांकित करता है जो माया के कारण उत्पन्न होता है।
वेद (Veda) जानता है वास्तविक रूप से पहचानना या अनुभव करना। केवल बौद्धिक रूप से जानना नहीं, बल्कि साक्षात्कृत करना।
न कश्चन (Na kaścana) कोई भी नहीं जानता कोई भी साधारण संसारी जीव, जो त्रिगुणात्मक माया के अधीन है, अपनी सीमित बुद्धि और इंद्रियों के बल पर भगवान के वास्तविक स्वरूप को जानने में असमर्थ है।

४. धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Context & Story)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान से जुड़ी हुई है, जहाँ अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे। अर्जुन को लग रहा था कि वे ही इस युद्ध के कर्ता हैं और उनके सगे-संबंधी जो सामने खड़े हैं, वे नष्ट हो जाएंगे। इस अज्ञान को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने विराट और अविनाशी स्वरूप का दर्शन कराया। इस विशिष्ट श्लोक के संदर्भ को समझने के लिए हमें श्रीमद्भागवत महापुराण की एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा का स्मरण करना होगा—"ब्रह्मा विमोहन लीला"।

एक बार जब भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन में बाल-लीलाएं कर रहे थे, तब सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के मन में यह संशय उत्पन्न हुआ कि क्या यह साधारण सा बालक, जो ग्वाल-बालों का जूठा खा रहा है, वास्तव में वही परब्रह्म नारायण है? अपनी शंका के निवारण के लिए ब्रह्मा जी ने श्रीकृष्ण के सभी बछड़ों और ग्वाल-बालों को चुराकर अपनी योगमाया से एक पर्वत की गुफा में छुपा दिया। वे देखना चाहते थे कि श्रीकृष्ण अब क्या करेंगे।

सर्वज्ञ भगवान श्रीकृष्ण, जो भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता हैं (वेदाहं समतीतानि...), तुरंत ब्रह्मा जी की इस लीला को समझ गए। उन्होंने बिना किसी प्रयास के स्वयं को ही उतने ही बछड़ों और ग्वाल-बालों के रूप में विस्तारित कर दिया। प्रत्येक बछड़ा और बालक साक्षात् श्रीकृष्ण का ही रूप था। एक वर्ष तक यह लीला चलती रही। जब ब्रह्मा जी वापस आए, तो उन्होंने देखा कि सभी बालक और बछड़े वैसे ही खेल रहे हैं। वे अत्यंत विस्मित हो गए। जब उन्होंने ध्यान लगाया, तो उन्हें प्रत्येक बालक और बछड़े में चतुर्भुज नारायण के दर्शन हुए। ब्रह्मा जी का अहंकार चूर-चूर हो गया। वे समझ गए कि भगवान की माया को पार पाना असंभव है और उन्हें कोई भी अपनी बुद्धि से नहीं जान सकता (मां तु वेद न कश्चन)।

यह कथा इस श्लोक के सत्य को पूर्णतः प्रमाणित करती है। भगवान अपनी योगमाया के परदे के पीछे छिपे रहते हैं। जैसे एक जादूगर के जादू को दर्शक नहीं समझ पाते, लेकिन जादूगर सब कुछ जानता है, वैसे ही भगवान इस संसार रूपी रंगमंच के सूत्रधार हैं। वे प्रत्येक जीव के हृदय में बैठकर उसके भूतकाल के कर्मों को देखते हैं, वर्तमान में उसे फल देते हैं और भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

५. नियमित पाठ, चिंतन एवं जप के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित पाठ और इसके गहरे अर्थ का मनन करने से साधक के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

भविष्य की चिंता से मुक्ति

जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि भगवान हमारे भविष्य को पहले से ही जानते हैं और वे हमारे परम हितैषी हैं, तो आने वाले कल की व्यग्रता और भय समाप्त हो जाता है।

अहंकार का समूल नाश

यह श्लोक हमें हमारी सीमाओं का स्मरण कराता है। यह जानकर कि हमारी बुद्धि अत्यंत सीमित है, साधक के भीतर से 'मैं ही सब कुछ जानता हूँ' का मिथ्या अहंकार नष्ट हो जाता है।

पूर्ण शरणागति का उदय

ईश्वर की सर्वज्ञता पर अटूट विश्वास होने से साधक के मन में अनन्य भक्ति और शरणागति (प्रपत्ति) का भाव जाग्रत होता है, जो मोक्ष का मुख्य द्वार है।

मानसिक शांति और स्थिरता

इस श्लोक के निरंतर चिंतन से मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं, जिससे अवसाद, तनाव और मानसिक अशांति का निवारण होता है।

कर्मों की शुद्धि

यह बोध कि भगवान हमारे प्रत्येक कर्म और विचार को प्रतिपल देख रहे हैं, हमें बुरे कर्मों और पापपूर्ण विचारों से दूर रखता है और सत्कर्मों की ओर प्रेरित करता है।

माया के बंधनों से मुक्ति

भगवान की असीम शक्ति का ज्ञान होने से संसार की नश्वरता स्पष्ट होने लगती है, जिससे सांसारिक आसक्ति कम होती है और वैराग्य का मार्ग सुगम होता है।

६. संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह आलेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत आता है, जिसे प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता) के प्रामाणिक भाष्यों के आलोक में संकलित किया गया है। आदि शंकराचार्य जी के 'शांकरभाष्य', श्री रामानुजाचार्य जी के 'श्रीभाष्य' और आधुनिक युग के महान संतों के विचारों का समन्वय करते हुए इस श्लोक की व्याख्या की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक बिना किसी मिलावट के, शास्त्रों के शुद्ध और व्यावहारिक ज्ञान को पहुँचाना है। यह सामग्री पूरी तरह से वैदिक परंपरा के सिद्धांतों के अनुकूल और शोधपरक है, जो जिज्ञासुओं के आध्यात्मिक उत्थान में सहायक सिद्ध होगी।

७. अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

भगवान श्रीकृष्ण परब्रह्म के अवतार हैं। परब्रह्म देश, काल और वस्तु की सीमाओं से परे होता है। चूँकि काल (समय) का निर्माण भी उन्हीं से हुआ है, इसलिए वे काल के तीनों रूपों—भूत, वर्तमान और भविष्य—के आदि, मध्य और अंत को एक साथ देखने में सक्षम हैं। साधारण जीव काल के अधीन है, जबकि भगवान काल के स्वामी (कालेश्वर) हैं, इसलिए वे सर्वज्ञ हैं।

इसका अर्थ यह है कि कोई भी जीव अपनी भौतिक इंद्रियों, मन और सीमित बुद्धि के बल पर भगवान के वास्तविक सच्चिदानंद स्वरूप को नहीं जान सकता। जब तक मनुष्य में 'मैं' और 'मेरा' का भाव रहता है, तब तक वह भगवान को नहीं जान सकता। किन्तु, जब कोई साधक भगवान की शरण में जाता है और उनकी कृपा प्राप्त करता है, तो भगवान स्वयं उसे अपना ज्ञान प्रदान करते हैं। जैसा कि गीता में ही आगे कहा गया है—"भक्त्या मामभिजानाति" (केवल भक्ति से ही मुझे जाना जा सकता है)।

भगवान की त्रिगुणात्मक माया (सत्व, रज, तम) के दो मुख्य कार्य हैं—'आवरण' और 'विक्षेप'। आवरण शक्ति सत्य को ढक देती है, जिससे जीव को भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन नहीं होता। विक्षेप शक्ति जीव को संसार की नश्वर वस्तुओं में उलझाए रखती है। इसी माया के कारण जीव संसार को ही सत्य मान लेता है और अपने वास्तविक स्वामी परमेश्वर को भूल जाता है।

दैनिक जीवन में यह श्लोक हमें 'चिंतामुक्त' रहने की कला सिखाता है। जब हम यह समझ जाते हैं कि हमारे जीवन की हर परिस्थिति (जो हमारे लिए भविष्य है) ईश्वर को पहले से ज्ञात है, तो हम व्यर्थ की चिंता छोड़कर अपने वर्तमान कर्तव्य (कर्म) पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं। यह हमें विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और मानसिक संतुलन बनाए रखने की शक्ति देता है।

हाँ, बिल्कुल। इस श्लोक का श्रद्धापूर्वक पाठ और इसके अर्थ का मनन करने से साधक के भीतर भगवान के प्रति अनन्य विश्वास जाग्रत होता है। जब जीव भगवान की सर्वज्ञता को स्वीकार कर उनकी शरण में जाता है, तो भगवान उसके पूर्व जन्मों के संचित पापों को भस्म कर देते हैं और उसे अपनी दिव्य भक्ति का वरदान देते हैं।

॥ श्री कृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य के समस्त प्राणियों को जानता हूँ। परन्तु मुझे कोई नहीं जानता।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वव्यापी है। उसे जानने के लिए उसकी कृपा और भक्ति आवश्यक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 26 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 26/30 87% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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