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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 25

अध्याय 7 · श्लोक 25

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढो ऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५॥

nāhaṃ prakāśaḥ sarvasya yoga-māyā-samāvṛtaḥ | mūḍho ’yaṃ nābhijānāti loko mām ajam avyayam ||25||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; अहम्: मैं; प्रकाशः: प्रकट; सर्वस्य: सबके लिए; योगमाया: योगमाया से; समावृतः: आवृत; मूढः: मूढ़; अयम्: यह; न: नहीं; अभिजानाति: जानता; लोकः: लोक; माम्: मुझे; अजम्: अजन्मा; अव्ययम्: अविनाशी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मैं योगमाया से आवृत होने के कारण सबके लिए प्रकट नहीं होता। यह मूढ़ संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।

English Translation

I am not manifest to all, being veiled by Yoga-Maya. This deluded world does not know Me, the unborn and imperishable.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान अपनी योगमाया से ढके रहते हैं, जिससे अज्ञानी उन्हें नहीं पहचान पाते।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।