श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 25

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 22 मिनट का पठन 147 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढो ऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
न
नहीं
अहम्
मैं
प्रकाशः
प्रकट
सर्वस्य
सबके लिए
योगमाया
योगमाया से
समावृतः
आवृत
मूढः
मूढ़
अयम्
यह
न
नहीं
अभिजानाति
जानता
लोकः
लोक
माम्
मुझे
अजम्
अजन्मा
अव्ययम्
अविनाशी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं योगमाया से आवृत होने के कारण सबके लिए प्रकट नहीं होता। यह मूढ़ संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः - आध्यात्मिक विवेचन

आध्यात्मिक प्रस्तावना: श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पच्चीसवाँ श्लोक—"नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः"—मानव चेतना और परमात्मा के बीच के उस सूक्ष्म पर्दे को उद्घाटित करता है, जिसे 'योगमाया' कहा जाता है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक कथन नहीं, बल्कि उस ब्रह्मांडीय सत्य का उद्घोष है जो हमें यह समझाता है कि क्यों सर्वव्यापी ईश्वर होते हुए भी साधारण दृष्टि से ओझल रहते हैं। वैदिक दर्शन के अनुसार, परमात्मा का स्वरूप अजन्मा (अज) और अविनाशी (अव्यय) है, किंतु हमारी भौतिक इंद्रियाँ और सांसारिक आसक्तियाँ एक ऐसे आवरण का निर्माण करती हैं, जो हमें उस दिव्य प्रकाश को देखने से रोकती हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक भक्त को 'अहंकार' और 'अज्ञान' के अंधकार से बाहर निकालने का मार्ग प्रशस्त करता है। जब हम यह समझ लेते हैं कि ईश्वर की माया हमें भ्रमित कर रही है, तो हमारी दृष्टि में एक सूक्ष्म परिवर्तन आता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि भक्ति का अर्थ केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस माया के आवरण को भेदकर परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करना है। यह ब्रह्मांडीय सत्य हमें यह बोध कराता है कि ईश्वर किसी से दूर नहीं हैं, बल्कि हमारी अज्ञानता ही उनके दर्शन में सबसे बड़ी बाधा है। इस श्लोक का चिंतन मन को स्थिरता, बुद्धि को विवेक और आत्मा को परमात्मा के प्रति समर्पित करने की अद्भुत शक्ति प्रदान करता है। यह सनातन धर्म की उस उच्च चेतना का प्रतीक है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच का अंतर केवल एक 'योगमाया' का पर्दा है, जिसे केवल शुद्ध प्रेम और ज्ञान के माध्यम से ही हटाया जा सकता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढो ऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। 'नाहं' (Na-aham) का उच्चारण करते समय नाद का अनुभव करें। 'योगमायासमावृतः' शब्द का उच्चारण करते समय यह अनुभव करें कि आप उस माया के आवरण को भेदने का प्रयास कर रहे हैं। इसे प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके तीन बार शांत चित्त से पाठ करना चाहिए। पाठ के उपरांत कुछ क्षण मौन रहकर उस 'अज' और 'अव्यय' परमात्मा का ध्यान करना अत्यंत फलदायी होता है। यह श्लोक गीता के सातवें अध्याय 'ज्ञानविज्ञानयोग' का सार है, जो साधक को माया के बंधनों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ननहींपरमात्मा का निषेधात्मक स्वरूप जो माया से परे है।
अहम्मैंस्वयं भगवान श्रीकृष्ण का अपना स्वरूप।
प्रकाशःप्रकाशित/प्रकटईश्वर का दिव्य तेज जो अज्ञानियों को नहीं दिखता।
सर्वस्यसबके लिएसंपूर्ण जगत के प्राणियों के लिए।
योगमायादिव्य शक्तिईश्वर की वह शक्ति जो सत्य को ढंक लेती है।
समावृतःढका हुआमाया के आवरण से ढका हुआ दिव्य सत्य।
मूढःअज्ञानी/मूर्खजो माया के वशीभूत होकर सत्य को नहीं देख पाता।
अजम्अजन्माजिसका कभी जन्म नहीं होता, जो शाश्वत है।
अव्ययम्अविनाशीजो कभी नष्ट नहीं होता, जो सदा एक समान है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'ज्ञानविज्ञानयोग' का उपदेश दे रहे हैं। यह श्लोक उस समय की पृष्ठभूमि में अत्यंत महत्वपूर्ण है जब अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में मोह और विषाद से ग्रस्त हैं। भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि संसार में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह उनकी 'योगमाया' का ही विस्तार है। पौराणिक संदर्भों में, जैसे कि श्रीमद्भागवत पुराण में भी भगवान की माया को 'दुर्जेया' (जिसे जानना कठिन हो) कहा गया है।

महाभारत के युद्ध के दौरान, जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपना विराट स्वरूप अर्जुन को दिखाया, तब अर्जुन को यह बोध हुआ कि जिसे वे केवल अपना मित्र और सारथी समझ रहे थे, वह वास्तव में वही 'अज' और 'अव्यय' परमात्मा हैं। यह श्लोक उसी सत्य की पुष्टि करता है। वेदों में भी 'माया' को 'अविद्या' के रूप में वर्णित किया गया है, जो आत्मा को परमात्मा से अलग होने का भ्रम देती है। ऋषि-मुनियों ने इस श्लोक के माध्यम से यह संदेश दिया है कि संसार के भौतिक सुख-दुख केवल एक नाटक (लीला) हैं। यदि हम इस माया के आवरण को हटा दें, तो हमें हर कण में ईश्वर का दर्शन होगा। यह श्लोक हमें यह याद दिलाता है कि हमारी बुद्धि जब तक सांसारिक भोगों में उलझी है, तब तक हम उस दिव्य प्रकाश को नहीं देख पाएंगे। यह ज्ञान ही वह कुंजी है जो मोक्ष के द्वार खोलती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: इस श्लोक के नियमित चिंतन से मन में व्याप्त अनावश्यक चिंताएं और भय समाप्त होते हैं।
  • अहंकार का नाश: यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि वह स्वयं कुछ नहीं है, सब कुछ ईश्वर की माया है, जिससे अहंकार का शमन होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: दिव्य शब्दों के उच्चारण से शरीर के चारों ओर एक सकारात्मक आभा मंडल (Aura) का निर्माण होता है।
  • विवेक की जागृति: यह श्लोक बुद्धि को सूक्ष्म बनाता है, जिससे व्यक्ति सत्य और असत्य के बीच भेद करना सीख जाता है।
  • कर्म शुद्धि: जब व्यक्ति यह समझ जाता है कि सब कुछ ईश्वर का है, तो वह निष्काम कर्म की ओर अग्रसर होता है।
  • ईश्वरीय कृपा: निरंतर पाठ से भक्त के प्रति भगवान की कृपा दृष्टि बनी रहती है और माया का प्रभाव कम होने लगता है।
  • भ्रम का निवारण: जीवन की कठिन परिस्थितियों में यह श्लोक व्यक्ति को भ्रमित होने से बचाता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह श्लोक साधक को आत्म-साक्षात्कार की यात्रा में आगे ले जाने वाला एक महत्वपूर्ण सोपान है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय (ज्ञानविज्ञानयोग) के मूल श्लोकों और विभिन्न भाष्यकारों (जैसे शंकराचार्य, रामानुजाचार्य) के दार्शनिक दृष्टिकोणों के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल और प्रामाणिक भाषा में प्रस्तुत करना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि आत्म-चिंतन और शास्त्र-सम्मत ज्ञान को प्राथमिकता देता है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल एक आध्यात्मिक मार्गदर्शिका के रूप में ग्रहण करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

योगमाया भगवान की वह दिव्य शक्ति है जो सत्य को छिपाकर असत्य को सत्य के रूप में दिखाती है। यह हमें सांसारिक मोह, लोभ और अहंकार में फंसाकर परमात्मा से दूर रखती है।

हाँ, निरंतर भक्ति, सत्संग, शास्त्र अध्ययन और निष्काम कर्म के द्वारा हम इस माया के आवरण को भेद सकते हैं। भगवान स्वयं कहते हैं कि जो मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।

'अज' का अर्थ है जिसका जन्म नहीं हुआ, और 'अव्यय' का अर्थ है जो कभी नष्ट नहीं होता। यह परमात्मा के शाश्वत स्वरूप को दर्शाता है।

ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) का समय इसके पाठ के लिए सर्वोत्तम है, क्योंकि इस समय मन शांत और एकाग्र होता है।

निश्चित रूप से। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी माया के प्रभाव से बचने के लिए यह श्लोक एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है, जो व्यक्ति को संसार में रहकर भी निर्लिप्त रहने की प्रेरणा देता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं योगमाया से आच्छादित होने के कारण सबके लिए प्रकट नहीं होता। यह मूढ़ संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर की लीला और माया अद्भुत है। जब तक माया का आवरण नहीं हटता, तब तक सत्य का साक्षात्कार नहीं होता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 25 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 25/30 83% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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