श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 23

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 24 मिनट का पठन 149 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
अन्तवत्
नाशवान्
तु
तो
फलम्
फल
तेषाम्
उनका
तत्
वह
भवति
होता है
अल्पमेधसाम्
अल्पबुद्धि वालों का
देवान्
देवताओं को
देवयजः
देवताओं के पूजक
यान्ति
प्राप्त होते हैं
मद्भक्ताः
मेरे भक्त
यान्ति
प्राप्त होते हैं
माम्
मुझको
अपि
भी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उन अल्पबुद्धि वालों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, परन्तु मेरे भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का सातवां अध्याय 'ज्ञान-विज्ञान योग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय का 23वां श्लोक भारतीय दर्शन और अध्यात्म की आधारशिला है। यह श्लोक हमें उस सूक्ष्म भेद को समझाता है जो 'सांसारिक उपलब्धि' और 'परम मोक्ष' के बीच स्थित है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से समस्त मानव जाति को यह चेतावनी दे रहे हैं कि क्षणिक सुखों की प्राप्ति के लिए की गई देवताओं की सकाम उपासना अंततः नाशवान फल ही प्रदान करती है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, भारत में देवताओं की पूजा का अपना एक विशिष्ट स्थान है, किंतु वेदों और उपनिषदों का अंतिम लक्ष्य 'ब्रह्म' की प्राप्ति है। जब हम किसी भौतिक इच्छा की पूर्ति हेतु देवताओं का आह्वान करते हैं, तो वह एक प्रकार का 'लेन-देन' (Transaction) बन जाता है। इसके विपरीत, 'मद्भक्ता यान्ति मामपि' का अर्थ है कि जो भक्त अनन्य भाव से भगवान की शरण में आता है, वह स्वयं भगवान के स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि जो कुछ भी उत्पन्न हुआ है, वह नष्ट होगा ही, परंतु परमात्मा का स्वरूप 'अविनाशी' है। इस श्लोक का चिंतन हमें यह सिखाता है कि हमारी प्रार्थनाओं का लक्ष्य क्या होना चाहिए—क्या हम केवल तुच्छ भौतिक सुखों की याचना कर रहे हैं, या हम उस शाश्वत आनंद की खोज में हैं जो कभी समाप्त नहीं होता? यह श्लोक साधक को 'अल्पमेधस' (अल्प बुद्धि) से ऊपर उठाकर 'विवेकशील' बनाने की एक दिव्य प्रक्रिया है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३॥

श्लोक का उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर पर स्पष्टता और लय का ध्यान रखना चाहिए। 'अन्तवत्तु' में 'त्' का उच्चारण आधा और स्पष्ट होना चाहिए। 'अल्पमेधसाम्' शब्द में 'म्' का उच्चारण अनुस्वार के रूप में नासिका से करें। इसे प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके तीन बार शुद्ध उच्चारण के साथ पढ़ना चाहिए। यह श्लोक न केवल बुद्धि को शुद्ध करता है, बल्कि साधक के मन में भक्ति के प्रति एक नई दृष्टि उत्पन्न करता है। इसे गीता के सातवें अध्याय के अन्य श्लोकों के साथ पढ़ने से मानसिक एकाग्रता में वृद्धि होती है और हृदय में सात्विक भावों का संचार होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अन्तवत्नाशवान / अंत होने वालासंसार की सभी भौतिक वस्तुएं काल के अधीन हैं।
तुनिश्चय हीयह एक निश्चित सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं।
फलंपरिणाम / फलकर्मों का वह प्रतिफल जो हम कामनाओं के साथ करते हैं।
तेषांउनकाउन लोगों का जो केवल सकाम भाव से पूजा करते हैं।
अल्पमेधसाम्अल्प बुद्धि वालेजिन्हें शाश्वत और क्षणिक का विवेक नहीं है।
देवान्देवताओं कोस्वर्ग के अधिपति और विभिन्न शक्तियों के स्वामी।
देवयजःदेवताओं के पूजकजो देवताओं को प्रसन्न कर भौतिक सुख चाहते हैं।
यान्तिप्राप्त करते हैंवे उन्हीं लोकों को जाते हैं जहाँ देवता निवास करते हैं।
मद्भक्ताःमेरे भक्तजो अनन्य भाव से परमात्मा को समर्पित हैं।
मामपिमुझे हीवे सीधे परमात्मा के धाम को प्राप्त करते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में, जब अर्जुन विषाद में डूबे हुए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध कराया। यह श्लोक उसी 'ज्ञान-विज्ञान योग' का हिस्सा है। पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि हिरण्यकश्यप या रावण जैसे असुरों ने भी देवताओं की कठोर तपस्या की थी, लेकिन उनका उद्देश्य केवल 'अहंकार' और 'भौतिक प्रभुत्व' था। परिणामस्वरूप, उन्हें जो फल मिला, वह भी 'अन्तवत्' (नाशवान) ही था।

वेदों में देवताओं की स्तुति की गई है, किंतु उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया है—'तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः'। अर्थात, बुद्धिमान पुरुष को उस परम ब्रह्म को जानकर ही अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। श्रीकृष्ण यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि देवताओं की पूजा गलत नहीं है, किंतु वह 'अल्पमेधस' (सीमित बुद्धि) का लक्षण है क्योंकि वह आपको जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं कर सकती। जब भक्त देवताओं को पूजता है, तो वह देवताओं के लोक (स्वर्ग) तक ही पहुँच पाता है, जहाँ पुण्य क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक में आना पड़ता है। इसके विपरीत, 'मद्भक्ता' (मेरे भक्त) सीधे उस स्थिति को प्राप्त करते हैं जहाँ से पुनः लौटकर नहीं आना पड़ता। यह शिक्षा हमें यह सिखाती है कि हमारी भक्ति का स्तर क्या है—क्या हम केवल 'याचक' हैं या 'प्रेमी'? यह श्लोक हमें याचना से ऊपर उठकर समर्पण की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • विवेक की जागृति: इस श्लोक का नियमित चिंतन करने से साधक में 'नित्य-अनित्य' वस्तु विवेक जागृत होता है।
  • मानसिक शांति: भौतिक इच्छाओं की पूर्ति न होने पर होने वाला दुख समाप्त हो जाता है, क्योंकि साधक का लक्ष्य ऊंचा हो जाता है।
  • अहंकार का नाश: 'अल्पमेधसाम्' शब्द का बोध हमें अपनी सीमाओं को पहचानने और विनम्र बनने में मदद करता है।
  • कर्म शुद्धि: सकाम भाव से निष्काम भाव की ओर संक्रमण करने में यह श्लोक एक उत्प्रेरक का कार्य करता है।
  • दैवीय कृपा: भगवान के प्रति अनन्य भक्ति का भाव हृदय में प्रेम और करुणा के स्रोत खोल देता है।
  • भय से मुक्ति: जब हम जानते हैं कि हमारा लक्ष्य 'अविनाशी' है, तो मृत्यु और विनाश का भय स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: मंत्र के रूप में जप करने से मन की चंचलता कम होती है और ध्यान में गहराई आती है।
  • सकारात्मक आभा: निरंतर गीता के ज्ञान का अभ्यास करने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक दिव्य तेज और ओज का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय (श्लोक 23) के मूल संस्कृत पाठ और शंकराचार्य, रामानुजाचार्य एवं आधुनिक वेदांत भाष्यकारों के सिद्धांतों पर आधारित है। 'भक्तिलोक' की टीम ने इसे अत्यंत सावधानी और शास्त्रीय मर्यादा के साथ संकलित किया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को केवल शब्दार्थ नहीं, बल्कि उस गूढ़ दार्शनिक भाव से जोड़ना है जो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास से परे, शुद्ध ज्ञान और भक्ति के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए तैयार की गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, देवताओं की पूजा गलत नहीं है। श्रीकृष्ण ने इसे 'अल्पमेधस' (सीमित बुद्धि) कहा है क्योंकि इसका फल नाशवान है। यदि आप निष्काम भाव से देवताओं की पूजा करते हैं, तो वह भी अंततः ईश्वर की ही पूजा है, किंतु सकाम भाव से की गई पूजा आपको संसार में ही उलझाए रखती है।

अल्पमेधस का अर्थ है 'कम बुद्धि वाला'। यहाँ इसका तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो शाश्वत आनंद को छोड़कर क्षणिक सुखों के पीछे भागता है। यह कोई अपमानजनक शब्द नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक चेतावनी है कि हम अपने लक्ष्य को बड़ा रखें।

मद्भक्ता का अर्थ है 'मेरे भक्त'। जो भक्त अपना सब कुछ भगवान को समर्पित कर देते हैं और किसी अन्य फल की इच्छा नहीं रखते, वे सीधे भगवान के धाम को प्राप्त करते हैं।

यह श्लोक कर्मकांड के विरुद्ध नहीं, बल्कि कर्मकांड के 'उद्देश्य' पर प्रश्न उठाता है। यदि कर्मकांड का उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति है, तो वह श्रेष्ठ है। यदि उद्देश्य केवल भौतिक लाभ है, तो वह सीमित है।

अपने दैनिक कार्यों और पूजा में 'निष्काम भाव' लाएं। जो भी कार्य करें, उसे ईश्वर को समर्पित करें। फल की चिंता छोड़कर केवल अपने कर्तव्य और भक्ति पर ध्यान केंद्रित करें।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

उन अल्पबुद्धि वालों का वह (देवोपासना से प्राप्त) फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, परन्तु मेरे भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भौतिक कामनाओं की पूर्ति अस्थायी है। परम लक्ष्य ईश्वर-प्राप्ति है, जो शाश्वत आनन्द देता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 23 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 23/30 77% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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