श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 21

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 41 मिनट का पठन 147 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
यः यः
जो-जो
याम् याम्
जिस-जिस
तनुम्
देवता के रूप को
भक्तः
भक्त
श्रद्धया
श्रद्धा से
अर्चितुम्
पूजा करने को
इच्छति
इच्छा करता है
तस्य तस्य
उस-उसकी
अचलाम्
अचल
श्रद्धाम्
श्रद्धा को
ताम्
उसी (देवता) में
एव
ही
विदधामि
स्थिर करता हूँ
अहम्
मैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो-जो भक्त जिस-जिस देवता के रूप को श्रद्धापूर्वक पूजना चाहता है, उस-उसकी श्रद्धा को मैं उसी देवता में अचल कर देता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

"यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥"

सनातन धर्म की विशालता और उसकी उदारता का सबसे अनुपम उदाहरण श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय (ज्ञानविज्ञानयोग) के इस २१वें श्लोक में देखने को मिलता है। यहाँ जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानव जाति को यह समझा रहे हैं कि ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग कितने भी भिन्न क्यों न हों, और जीव अपनी रुचि व प्रकृति के अनुसार जिस भी दिव्य रूप की आराधना करना चाहे, भगवान उसकी उस श्रद्धा का अनादर नहीं करते। इसके विपरीत, वे स्वयं उस भक्त की श्रद्धा को उसी रूप में और अधिक दृढ़, स्थिर और अचला बना देते हैं। यह श्लोक ईश्वर की परम करुणामयी, सर्वव्यापी और निष्पक्ष प्रकृति को उजागर करता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस श्लोक का महत्व असाधारण है। यह हमें सिखाता है कि सनातन परंपरा में संकीर्णता या कट्टरता के लिए कोई स्थान नहीं है। प्रत्येक मनुष्य की मानसिक चेतना, उसके पूर्वजन्मों के संस्कार और उसकी वर्तमान परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं। इन भिन्नताओं के कारण उसकी आध्यात्मिक रुचि भी भिन्न होती है। कोई भगवान शिव की आराधना में लीन होना चाहता है, कोई देवी शक्ति की उपासना में सुख पाता है, तो कोई श्रीगणेश, सूर्यदेव या विष्णु के किसी अवतार के प्रति आकर्षित होता है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि वे किसी भी सच्चे उपासक की श्रद्धा को खंडित नहीं करते, बल्कि वे प्रत्येक हृदय में 'परमात्मा' रूप में विराजमान होकर उस श्रद्धा को पोषण प्रदान करते हैं।

यह श्लोक ब्रह्मांडीय चेतना (Cosmic Consciousness) के उस नियम को प्रतिपादित करता है जहाँ श्रद्धा ही समस्त आध्यात्मिक उन्नति की कुंजी है। श्रद्धा के बिना किया गया कोई भी अनुष्ठान निष्प्राण होता है। भगवान इस श्लोक में स्वयं को श्रद्धा के दाता और रक्षक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो यह सिद्ध करता है कि अंततः सभी मार्ग उसी एक परम सत्य की ओर जाते हैं, भले ही उनके आरंभिक बिंदु भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हों।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१॥

काव्यमय लिप्यंतरण (Transliteration):

yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śraddhayārcitum icchati |
tasya tasyācalāṁ śraddhāṁ tām eva vidadhāmy aham || 21 ||

पाठ एवं जप की प्रामाणिक विधि:

इस अत्यंत कल्याणकारी श्लोक का पाठ करने से साधक के भीतर मानसिक स्थिरता, एकाग्रता और अटूट श्रद्धा का उदय होता है। इसके जप की विधि इस प्रकार है:

  • समय: ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) या संध्याकाल का समय इस श्लोक के मानसिक चिंतन और जप के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
  • आसन व दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के स्वच्छ आसन पर बैठें।
  • ध्यान: हृदय कमल में चतुर्भुज नारायण या अपने इष्टदेव का ध्यान करते हुए दोनों हाथ जोड़कर श्लोक का उच्चारण करें।
  • उच्चारण नियम: श्लोक का उच्चारण करते समय 'अनुष्टुप छंद' की लय का पालन करें। प्रत्येक शब्द को स्पष्ट और शुद्ध रूप से बोलें, जिससे ध्वनि तरंगें मस्तिष्क में सकारात्मक कंपन उत्पन्न कर सकें।
  • संकल्प: यदि आप अपनी डगमगाती श्रद्धा को स्थिर करना चाहते हैं, तो इस श्लोक का प्रतिदिन २१ या १०८ बार जप करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यो यो (yaḥ yaḥ) जो-जो (जो भी भक्त) यह शब्द ईश्वर की सार्वभौमिकता को दर्शाता है। इसमें जाति, वर्ण, लिंग या संप्रदाय का कोई भेद नहीं है। हर मनुष्य को अपनी उपासना चुनने का अधिकार है।
यां यां (yām yām) जिस-जिस (स्वरूप को) यह इंगित करता है कि परमात्मा के अनंत रूप हैं। साधक अपनी मानसिक चेतना के अनुसार किसी भी रूप को चुन सकता है।
तनुम् (tanum) शरीर / देवता के स्वरूप को यहाँ 'तनु' का अर्थ केवल भौतिक शरीर नहीं, बल्कि देवताओं के विभिन्न विग्रहों और शक्तियों से है, जो अंततः उसी एक परमेश्वर की विभूतियाँ हैं।
भक्तः (bhaktaḥ) उपासक / भक्त वह व्यक्ति जो श्रद्धापूर्वक किसी उच्च शक्ति के प्रति समर्पित होने की इच्छा रखता है।
श्रद्धया (śraddhayā) श्रद्धा के साथ श्रद्धा वह आंतरिक शक्ति है जो बुद्धि से परे जाकर हृदय को परमात्मा से जोड़ती है। यह पूजा की प्राण-शक्ति है।
अर्चितुम् (arcitum) पूजा / अर्चना करने की बाह्य और आंतरिक क्रियाओं द्वारा अपने आराध्य के प्रति आदर, प्रेम और समर्पण व्यक्त करने की प्रक्रिया।
इच्छति (icchati) इच्छा करता है जीव की स्वतंत्र इच्छा (Free Will)। भगवान जीव की इस इच्छा का सम्मान करते हैं और उस पर अपनी इच्छा नहीं थोपते।
तस्य तस्य (tasya tasya) उस-उस (भक्त की) प्रत्येक व्यक्तिगत भक्त के प्रति भगवान का व्यक्तिगत ध्यान। वे हर एक की पुकार को अलग से सुनते हैं।
अचलाम् (acalām) अडिग / स्थिर / अचल ऐसी श्रद्धा जो संशय, तर्क या विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित न हो। भगवान उसे संशय-रहित बना देते हैं।
श्रद्धाम् (śraddhām) श्रद्धा को विश्वास की वह पराकाष्ठा जो भक्त को उसके लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक होती है।
ताम् एव (tām eva) उसी को ही जिस रूप में भक्त की रुचि है, उसी रूप में। भगवान उसकी रुचि को जबरन नहीं बदलते, बल्कि उसी को परिपक्व करते हैं।
विदधामि (vidadhāmi) व्यवस्थित / सुदृढ़ करता हूँ भगवान स्वयं उस श्रद्धा के पोषण का दायित्व लेते हैं। वे हृदय में बैठकर संशयों का निवारण करते हैं।
अहम् (aham) मैं (परमेश्वर श्रीकृष्ण) यह घोषणा करती है कि सभी देवताओं के पीछे की परम सत्ता और श्रद्धा को स्थिर करने वाले एकमात्र सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण ही हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आता है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, मृत्यु, आत्मा और परमात्मा के परम ज्ञान से अवगत कराया। सातवें अध्याय में, जिसे 'ज्ञानविज्ञानयोग' कहा जाता है, भगवान अपनी परा और अपरा प्रकृति का वर्णन करते हैं। वे समझाते हैं कि यह संपूर्ण जगत उनकी माया से मोहित है, और बहुत कम लोग इस माया को पार कर पाते हैं।

इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें वैदिक देवशास्त्र (Vedic Pantheon) और उपनिषदों के दर्शन को समझना होगा। वेदों में अनेक देवताओं जैसे इंद्र, वरुण, अग्नि, मित्र और सूर्य की स्तुति की गई है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध उद्घोष है—"एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (सत्य एक ही है, ज्ञानी पुरुष उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं)। भगवान श्रीकृष्ण इसी शाश्वत सत्य को गीता में पुनः स्थापित कर रहे हैं।

एक सुंदर पौराणिक दृष्टांत: पुराणों में एक कथा आती है कि एक बार एक सरल हृदय का वनवासी भगवान शिव की खोज में निकला। उसे किसी ने कह दिया कि शिवजी पत्थर के रूप में पर्वत पर रहते हैं। वह एक साधारण पत्थर को ही शिव मानकर उसकी अत्यंत श्रद्धा से सेवा करने लगा। यद्यपि वह पत्थर कोई सिद्ध विग्रह नहीं था, परंतु उस वनवासी की श्रद्धा इतनी तीव्र थी कि स्वयं महादेव को उस पत्थर से प्रकट होना पड़ा। जब देवताओं ने पूछा कि प्रभु, आपने इस साधारण पत्थर के लिए ऐसा क्यों किया? तब शिवजी ने कहा कि मैं पत्थर में नहीं, बल्कि उस भक्त की उस 'अचला श्रद्धा' में बंधा हुआ था, जिसे मेरे परमेश्वर रूप (श्रीकृष्ण) ने उसके हृदय में सुदृढ़ किया था।

भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जो लोग भौतिक कामनाओं (सकाम भाव) से प्रेरित होकर अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं, वे वास्तव में अपनी अल्पबुद्धि के कारण ऐसा करते हैं। परंतु, भगवान उन पर भी क्रोधित नहीं होते। वे जानते हैं कि जीव अभी विकास के प्राथमिक चरण में है। जैसे एक दयालु पिता अपने बच्चे के खिलौने के प्रति प्रेम को देखकर उसे डांटता नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उसे परिपक्व करता है, वैसे ही भगवान भी भक्त की प्रारंभिक श्रद्धा को सहारा देते हैं। वे जानते हैं कि जब यह श्रद्धा परिपक्व होगी, तो भक्त अंततः सभी रूपों के पीछे छिपे एक ही परमेश्वर को पहचान लेगा।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक के नियमित चिंतन, मनन और जप से साधक को निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:

१. मानसिक शांति और स्थिरता

यह श्लोक मन के भीतर चल रहे द्वंद्वों और संशयों को समाप्त करता है। जब साधक को यह विश्वास हो जाता है कि उसका ईश्वर उसकी श्रद्धा की रक्षा कर रहा है, तो उसका मन परम शांत हो जाता है।

२. श्रद्धा का सुदृढ़ीकरण

यदि आपकी पूजा-पाठ में मन नहीं लगता या श्रद्धा डगमगाती है, तो इस श्लोक का जप आपकी श्रद्धा को 'अचला' (अडिग) बना देता है, जिससे साधना में तीव्रता आती है।

३. धार्मिक सहिष्णुता और उदारता का विकास

इस श्लोक का ज्ञान साधक के भीतर से संकीर्णता को मिटाता है। वह अन्य संप्रदायों और उपासना पद्धतियों का आदर करना सीखता है, जिससे सामाजिक समरसता बढ़ती है।

४. अहंकार की निवृत्ति

साधक यह समझ जाता है कि उसकी भक्ति और श्रद्धा भी उसकी अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि भगवान की कृपा से ही संभव हो पा रही है। इससे साधक का आध्यात्मिक अहंकार नष्ट होता है।

५. सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का विस्तार

इस श्लोक के नियमित उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक आभामंडल (Aura) का निर्माण करती हैं।

६. कर्मों का शुद्धिकरण

जब श्रद्धा स्थिर होती है, तो मनुष्य के कर्म भी निष्काम और पवित्र होने लगते हैं। वह फल की चिंता छोड़कर अपने आराध्य को कर्म समर्पित करने लगता है।

७. भय और चिंता से मुक्ति

भगवान स्वयं जब श्रद्धा के रक्षक बन जाते हैं, तो साधक भविष्य की चिंताओं और अज्ञात भयों से मुक्त होकर वर्तमान में जीना सीख जाता है।

८. क्रमिक आध्यात्मिक उन्नति

यह श्लोक साधक को सकाम भक्ति (संसार की चाह) से उठाकर निष्काम भक्ति (ईश्वर की चाह) की ओर ले जाने में एक सेतु का कार्य करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह विश्लेषण श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य कृत 'शांकरभाष्य', श्री रामानुजाचार्य कृत 'श्रीभाष्य' और आधुनिक युग के महान संतों के विचारों) के गहन अध्ययन पर आधारित संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। सनातन धर्म के ग्रंथों में निहित गूढ़ रहस्यों को जनमानस तक सरल और सुबोध भाषा में पहुँचाना ही हमारा मुख्य उद्देश्य है। इस श्लोक का संदेश किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि यह मनुष्य के अंतःकरण की स्वतंत्रता और ईश्वर की असीम अनुकंपा को रेखांकित करता है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस ज्ञान को अपने दैनिक जीवन में उतारकर अपने आत्मिक बल को सुदृढ़ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'तनुम्' का शाब्दिक अर्थ 'शरीर' या 'स्वरूप' होता है। इस श्लोक के संदर्भ में, इसका अर्थ उन विभिन्न देवताओं के विग्रहों और रूपों से है जिनकी मनुष्य उपासना करता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, सभी देवता परमेश्वर के ही विराट शरीर के विभिन्न अंग या शक्तियाँ हैं। इसलिए, जब कोई भक्त किसी देवता की पूजा करता है, तो वह अनजाने में परमेश्वर के ही एक विशिष्ट रूप (तनु) की अर्चना कर रहा होता है।

नहीं, भगवान श्रीकृष्ण किसी को हतोत्साहित नहीं करते। इसके विपरीत, वे इस श्लोक में स्पष्ट कहते हैं कि वे स्वयं उस भक्त की श्रद्धा को उसी देवता के प्रति और अधिक दृढ़ कर देते हैं। भगवान प्रत्येक जीव की स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं। वे जानते हैं कि हर जीव अपनी चेतना के स्तर के अनुसार ही पूजा का चयन करता है, और समय के साथ धीरे-धीरे उसकी चेतना का विकास होगा।

मनुष्य का पुरुषार्थ 'इच्छा' करने और 'शुरुआती कदम' उठाने में है (जैसा कि श्लोक में 'इच्छति' शब्द से स्पष्ट है)। जब मनुष्य सच्चे हृदय से किसी दिव्य शक्ति की ओर कदम बढ़ाता है, तो भगवान उसके इस प्रयास को देखकर अपनी कृपा से उसकी श्रद्धा को 'अचला' (अडिग) बना देते हैं। पुरुषार्थ जीव का है, और उस पुरुषार्थ को पूर्णता प्रदान करने वाली कृपा ईश्वर की है।

व्यावहारिक जीवन में यह श्लोक हमें 'स्वीकार्यता' और 'धैर्य' का संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि हमें दूसरों के विचारों, विश्वासों और उनकी जीवन-शैली का सम्मान करना चाहिए। जैसे भगवान किसी की श्रद्धा को जबरन नहीं बदलते, वैसे ही हमें भी दूसरों पर अपने विचार नहीं थोपने चाहिए। इसके अतिरिक्त, यह श्लोक हमें अपने चुने हुए मार्ग पर पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

हाँ, इस श्लोक के ठीक अगले श्लोक (अध्याय ७, श्लोक २२) में भगवान स्पष्ट करते हैं कि देवताओं की आराधना से जो फल प्राप्त होते हैं, वे वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ही विहित (स्वीकृत) किए जाते हैं। देवता केवल माध्यम हैं, फल देने की अंतिम शक्ति परमेश्वर के पास ही है।

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

"जिस प्रकार सभी नदियाँ अंततः सागर में जाकर मिलती हैं, उसी प्रकार सभी श्रद्धापूर्वक की गई पूजाएँ अंततः एक ही परमेश्वर तक पहुँचती हैं।"

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो-जो भक्त जिस-जिस देवता के रूप को श्रद्धापूर्वक पूजना चाहता है, मैं उस-उसकी श्रद्धा को उसी देवता में अचल कर देता हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर ही सबके हृदय में स्थित है और प्रत्येक भक्त की श्रद्धा के अनुसार उसे फल प्रदान करता है। वह सभी की भक्ति का सम्मान करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
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श्लोक 21/30 70% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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