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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 20

अध्याय 7 · श्लोक 20

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्ते ऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २०॥

kāmais tais tair hṛta-jñānāḥ prapadyante ’nya-devatāḥ | taṃ taṃ niyamam āsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā ||20||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कामैः: कामनाओं से; तैस्तैः: उन-उन (विभिन्न); हृतज्ञानाः: जिनका ज्ञान हर लिया गया है; प्रपद्यन्ते: शरण लेते हैं; अन्यदेवताः: अन्य देवताओं की; तं तम्: उस-उस; नियमम्: नियम को; आस्थाय: अपना कर; प्रकृत्या: प्रकृति से; नियताः: नियन्त्रित; स्वया: अपनी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जिनका ज्ञान विविध कामनाओं से हर लिया गया है, वे अपनी-अपनी प्रकृति के वशीभूत होकर अन्य देवताओं की शरण लेते हैं और उन-उन के नियमों का पालन करते हैं।

English Translation

Those whose wisdom has been carried away by various desires go to other gods, observing various rites, compelled by their own nature.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जो लोग सांसारिक कामनाओं में फँसे हैं, वे विभिन्न देवी-देवताओं की उपासना करते हैं, किन्तु उनकी शरणागति सच्ची नहीं होती।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।