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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 18

अध्याय 7 · श्लोक 18

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८॥

udārāḥ sarva evaite jñānī tv ātmaiva me matam | āsthitaḥ sa hi yuktātmā mām evānuttamāṃ gatim ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

उदाराः: उदार; सर्वे: सभी; एव: ही; एते: ये; ज्ञानी: ज्ञानी; तु: तो; आत्मा: स्वरूप; एव: ही; मे: मेरा; मतम्: मत; आस्थितः: स्थित; सः: वह; हि: निश्चय ही; युक्तात्मा: युक्तचित्त; माम्: मुझको; एव: ही; अनुत्तमाम्: उत्तम; गतिम्: गति (लक्ष्य) मानकर।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

ये सभी (चारों) उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है – ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह युक्तचित्त होकर मुझ अनुत्तम गति में ही स्थित रहता है।

English Translation

All these (devotees) are indeed noble; but the wise man is verily My very Self, according to My considered opinion. For, steadfast in mind, he is established in Me alone, the Supreme Goal.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ज्ञानी भक्त को भगवान अपने समान मानते हैं, क्योंकि वह पूर्णतया उनमें ही स्थित रहता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।