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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 17

अध्याय 7 · श्लोक 17

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७॥

teṣāṃ jñānī nitya-yukta eka-bhaktir viśiṣyate | priyo hi jñānino ’tyartham ahaṃ sa ca mama priyaḥ ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तेषाम्: उनमें से; ज्ञानी: ज्ञानी; नित्ययुक्तः: नित्ययुक्त (सदा मुझमें लगा हुआ); एकभक्ति: अनन्य भक्ति वाला; विशिष्यते: श्रेष्ठ है; प्रियः: प्रिय; हि: निश्चय ही; ज्ञानिनः: ज्ञानी को; अत्यर्थम्: अत्यन्त; अहम्: मैं; सः: वह; च: भी; मम: मेरा; प्रियः: प्रिय।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

उन (चारों) में ज्ञानी, जो नित्ययुक्त और एकनिष्ठ भक्त है, सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि मैं ज्ञानी को अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।

English Translation

Among them, the wise man who is ever-steadfast and devoted to the One (Me) excels. For I am exceedingly dear to the wise, and he is dear to Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ज्ञानी भक्त सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि वह अनन्य भाव से ईश्वर में लीन रहता है और उनके परस्पर प्रेम का संबंध अद्वितीय है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।