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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 1

अध्याय 3 · श्लोक 1

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अर्जुन उवाच | ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन | तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ||१||

arjuna uvāca | jyāyasī cet karmaṇas te matā buddhir janārdana | tat kiṃ karmaṇi ghore māṃ niyojayasi keśava ||1||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अर्जुन: अर्जुन; उवाच: बोले; ज्यायसी: श्रेष्ठ; चेत्: यदि; कर्मण: कर्म से; ते: आपकी; मता: मानी गयी; बुद्धि: बुद्धि; जनार्दन: हे जनार्दन; तत्: तो; किम्: क्यों; कर्मणि: कर्म में; घोरे: भयंकर; माम्: मुझे; नियोजयसि: लगा रहे हो; केशव: हे केशव।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अर्जुन बोले: हे जनार्दन! हे केशव! यदि आप कर्म (फल-प्रधान कर्म) से बुद्धि को श्रेष्ठ मानते हैं, तो मुझे इस भयंकर युद्ध में क्यों लगा रहे हैं?

English Translation

Arjuna said: O Janardana, O Kesava, if You consider that the path of intellectual knowledge (Buddhi Yoga) is superior to fruitive action, then why do You engage me in this terrible warfare?

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन पिछले अध्याय के उपदेशों में विरोधाभास देखते हैं – एक ओर ज्ञान की श्रेष्ठता, दूसरी ओर युद्ध जैसे हिंसक कर्म की प्रेरणा। यह प्रश्न कर्म योग के मर्म को समझने का आधार बनता है। Arjuna sees a contradiction between the praise of knowledge and the urging to fight; this question sets the stage for the doctrine of Karma Yoga.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।