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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 17

अध्याय 2 · श्लोक 17

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् | विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ||१७||

avināśi tu tad viddhi yena sarvam idaṃ tatam | vināśam avyayasyāsya na kaścit kartum arhati ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अविनाशि: अविनाशी; तु: निश्चय ही; तत्: उसे; विद्धि: जानो; येन: जिससे; सर्वम्: सब; इदम्: यह; ततम्: व्याप्त है; विनाशम्: नाश; अव्ययस्य: अव्यय (अविनाशी) का; अस्य: इस; न: नहीं; कश्चित्: कोई भी; कर्तुम्: कर सकता; अर्हति: योग्य है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

उस (तत्त्व) को तू अविनाशी जान, जिससे यह सब व्याप्त है। इस अव्यय का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।

English Translation

Know that alone to be imperishable which pervades all this. None can cause the destruction of this immutable One.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आत्मतत्त्व सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है और अविनाशी है। कोई भी इसका नाश नहीं कर सकता। यह कृष्ण के उपदेश का मूल है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।