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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 16

अध्याय 2 · श्लोक 16

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः | उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ||१६||

nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ | ubhayor api dṛṣṭo 'ntas tv anayos tattva-darśibhiḥ ||16||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; असतः: असत् (अविद्यमान) का; विद्यते: है; भावः: सत्ता; न: नहीं; अभावः: अभाव (नाश); विद्यते: है; सतः: सत् (विद्यमान) का; उभयोः: दोनों का; अपि: भी; दृष्टः: देखा गया है; अन्तः: निष्कर्ष; तु: निश्चय ही; अनयोः: इन दोनों का; तत्त्वदर्शिभिः: तत्त्वदर्शियों द्वारा।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

असत् (नाशवान) की सत्ता नहीं है और सत् (अविनाशी) का नाश नहीं है। इन दोनों का यह तत्त्व तत्त्वदर्शियों ने जाना है।

English Translation

The unreal has no existence; the real never ceases to be. The seers of truth have concluded thus about both.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक सत् और असत् का विवेचन करता है। शरीर आदि असत् हैं (नाशवान), आत्मा सत् है (अविनाशी)। तत्त्वदर्शी इस भेद को जानते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।