सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 15

श्लोक १५ में कृष्ण कहते हैं कि जो सुख-दुःख में समान रहता है, वह अमरता का अधिकारी होता है।

संस्कृत श्लोक

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ | समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ||१५||

yaṃ hi na vyathayanty ete puruṣaṃ puruṣarṣabha | sama-duḥkha-sukhaṃ dhīraṃ so 'mṛtatvāya kalpate ||15||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यम्: जिस; हि: निश्चय ही; न: नहीं; व्यथयन्ति: विचलित करते; एते: ये; पुरुषम्: मनुष्य को; पुरुषर्षभ: हे पुरुषश्रेष्ठ; समदुःखसुखम्: सुख-दुःख में सम; धीरम्: धीर; सः: वह; अमृतत्वाय: अमरता के लिए; कल्पते: योग्य होता है।

हिंदी अनुवाद

हे पुरुषश्रेष्ठ! जिस पुरुष को ये (सुख-दुःख) विचलित नहीं करते और जो सुख-दुःख में समान रहता है, वह धीर पुरुष अमरता के लिए योग्य हो जाता है।

English Translation

O best among men, that person who is not disturbed by pleasure and pain, and is equal in both, becomes fit for immortality.

टीका / Commentary

कृष्ण निष्कर्ष देते हैं कि जो सुख-दुःख में समभाव रखता है, वही वास्तव में धीर है और मोक्ष का अधिकारी बनता है।