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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 15

अध्याय 2 · श्लोक 15

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ | समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ||१५||

yaṃ hi na vyathayanty ete puruṣaṃ puruṣarṣabha | sama-duḥkha-sukhaṃ dhīraṃ so 'mṛtatvāya kalpate ||15||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यम्: जिस; हि: निश्चय ही; न: नहीं; व्यथयन्ति: विचलित करते; एते: ये; पुरुषम्: मनुष्य को; पुरुषर्षभ: हे पुरुषश्रेष्ठ; समदुःखसुखम्: सुख-दुःख में सम; धीरम्: धीर; सः: वह; अमृतत्वाय: अमरता के लिए; कल्पते: योग्य होता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पुरुषश्रेष्ठ! जिस पुरुष को ये (सुख-दुःख) विचलित नहीं करते और जो सुख-दुःख में समान रहता है, वह धीर पुरुष अमरता के लिए योग्य हो जाता है।

English Translation

O best among men, that person who is not disturbed by pleasure and pain, and is equal in both, becomes fit for immortality.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण निष्कर्ष देते हैं कि जो सुख-दुःख में समभाव रखता है, वही वास्तव में धीर है और मोक्ष का अधिकारी बनता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।