सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 14

श्लोक १४ में कृष्ण कहते हैं कि सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं, इसलिए उन्हें सहन करना चाहिए।

संस्कृत श्लोक

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः | आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ||१४||

mātrā-sparśās tu kaunteya śītoṣṇa-sukha-duḥkha-dāḥ | āgamāpāyino 'nityās tāṃs titikṣasva bhārata ||14||

पदच्छेद / शब्दार्थ

मात्रास्पर्शाः: इन्द्रिय और विषयों के संयोग; तु: तो; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; शीतोष्णसुखदुःखदाः: सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख देने वाले; आगमापायिनः: आते-जाते रहने वाले; अनित्याः: अनित्य; तान्: उन्हें; तितिक्षस्व: सहन करो; भारत: हे भारत।

हिंदी अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों के विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख तो आते-जाते रहते हैं और अनित्य हैं। हे भारत! तू उन्हें सहन कर।

English Translation

O son of Kunti, the contacts of the senses with their objects give rise to cold and heat, pleasure and pain. They come and go and are impermanent. Endure them, O Bharata.

टीका / Commentary

कृष्ण अब व्यावहारिक उपदेश देते हैं। सांसारिक सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं, इसलिए उन्हें समभाव से सहन करना चाहिए। यह स्थितप्रज्ञता की ओर पहला कदम है।