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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 14

अध्याय 2 · श्लोक 14

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः | आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ||१४||

mātrā-sparśās tu kaunteya śītoṣṇa-sukha-duḥkha-dāḥ | āgamāpāyino 'nityās tāṃs titikṣasva bhārata ||14||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मात्रास्पर्शाः: इन्द्रिय और विषयों के संयोग; तु: तो; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; शीतोष्णसुखदुःखदाः: सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख देने वाले; आगमापायिनः: आते-जाते रहने वाले; अनित्याः: अनित्य; तान्: उन्हें; तितिक्षस्व: सहन करो; भारत: हे भारत।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों के विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख तो आते-जाते रहते हैं और अनित्य हैं। हे भारत! तू उन्हें सहन कर।

English Translation

O son of Kunti, the contacts of the senses with their objects give rise to cold and heat, pleasure and pain. They come and go and are impermanent. Endure them, O Bharata.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण अब व्यावहारिक उपदेश देते हैं। सांसारिक सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं, इसलिए उन्हें समभाव से सहन करना चाहिए। यह स्थितप्रज्ञता की ओर पहला कदम है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।