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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 13

अध्याय 2 · श्लोक 13

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा | तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ||१३||

dehino 'smin yathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā | tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati ||13||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

देहिनः: शरीरी (आत्मा) की; अस्मिन्: इस; यथा: जैसे; देहे: शरीर में; कौमारम्: बचपन; यौवनम्: जवानी; जरा: बुढ़ापा; तथा: वैसे ही; देहान्तरप्राप्तिः: दूसरे शरीर की प्राप्ति; धीरः: धीर पुरुष; तत्र: उसमें; न: नहीं; मुह्यति: मोहित होता।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जैसे इस शरीर में आत्मा को बचपन, जवानी और बुढ़ापा प्राप्त होता है, वैसे ही उसे दूसरे शरीर की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इस विषय में मोहित नहीं होते।

English Translation

Just as in this body the embodied (soul) passes through childhood, youth, and old age, so also it passes to another body. The wise are not deluded by this.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण तर्क देते हैं: जिस प्रकार शरीर के बदलने (बचपन से जवानी, जवानी से बुढ़ापा) पर हम मोहित नहीं होते, उसी प्रकार एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने पर भी मोह नहीं करना चाहिए। आत्मा नित्य है, शरीर नश्वर।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।