सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 13
श्लोक १३ में आत्मा के एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने की तुलना बाल्यावस्था से युवावस्था में जाने से की गई है।
संस्कृत श्लोक
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा | तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ||१३||
dehino 'smin yathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā | tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati ||13||
पदच्छेद / शब्दार्थ
देहिनः: शरीरी (आत्मा) की; अस्मिन्: इस; यथा: जैसे; देहे: शरीर में; कौमारम्: बचपन; यौवनम्: जवानी; जरा: बुढ़ापा; तथा: वैसे ही; देहान्तरप्राप्तिः: दूसरे शरीर की प्राप्ति; धीरः: धीर पुरुष; तत्र: उसमें; न: नहीं; मुह्यति: मोहित होता।
हिंदी अनुवाद
जैसे इस शरीर में आत्मा को बचपन, जवानी और बुढ़ापा प्राप्त होता है, वैसे ही उसे दूसरे शरीर की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इस विषय में मोहित नहीं होते।
English Translation
Just as in this body the embodied (soul) passes through childhood, youth, and old age, so also it passes to another body. The wise are not deluded by this.
टीका / Commentary
कृष्ण तर्क देते हैं: जिस प्रकार शरीर के बदलने (बचपन से जवानी, जवानी से बुढ़ापा) पर हम मोहित नहीं होते, उसी प्रकार एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने पर भी मोह नहीं करना चाहिए। आत्मा नित्य है, शरीर नश्वर।