सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 12

श्लोक १२ में कृष्ण कहते हैं कि आत्मा कभी नष्ट नहीं होती – वह सदा रहती है।

संस्कृत श्लोक

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः | न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ||१२||

na tv evāhaṃ jātu nāsaṃ na tvaṃ neme janādhipāḥ | na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayam ataḥ param ||12||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; तु: लेकिन; एव: निश्चय ही; अहम्: मैं; जातु: कभी; न: नहीं; आसम्: था; न: नहीं; त्वम्: तुम; न: नहीं; इमे: ये; जनाधिपाः: राजा; न: नहीं; च: और; एव: निश्चय ही; न: नहीं; भविष्यामः: होंगे; सर्वे: सभी; वयम्: हम; अतः: इसके बाद; परम्: आगे।

हिंदी अनुवाद

ऐसा कभी नहीं था कि मैं नहीं था, या तुम नहीं थे, या ये राजा नहीं थे; और ऐसा नहीं है कि आगे से हम सब नहीं रहेंगे।

English Translation

Never was there a time when I did not exist, nor you, nor these rulers of men. Nor will there ever be a time when we shall all cease to exist.

टीका / Commentary

कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि आत्मा की सत्ता तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) में निरन्तर बनी रहती है। मैं (कृष्ण), तुम (अर्जुन), और ये सभी राजा – सब आत्माएँ शाश्वत हैं।