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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 11

अध्याय 2 · श्लोक 11

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच | अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे | गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ||११||

śrī-bhagavān uvāca | aśocyān anvaśocas tvaṃ prajñā-vādāṃś ca bhāṣase | gatāsūn agatāsūṃś ca nānuśocanti paṇḍitāḥ ||11||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान; उवाच: बोले; अशोच्यान्: जिनका शोक नहीं करना चाहिए; अन्वशोचः: शोक करते हो; त्वम्: तुम; प्रज्ञावादान्: प्रज्ञा के वचन; च: और; भाषसे: बोलते हो; गतासून्: मृत शरीरों के लिए; अगतासून्: जीवितों के लिए; च: और; न: नहीं; अनुशोचन्ति: शोक करते; पण्डिताः: विद्वान।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: तू उनके लिए शोक करता है जिनके लिए शोक नहीं करना चाहिए, और प्रज्ञा (बुद्धि) की बातें भी करता है। ज्ञानी लोग जीवितों के लिए और मरे हुओं के लिए भी शोक नहीं करते।

English Translation

The Supreme Lord said: You grieve for those who should not be grieved for, yet you speak words of wisdom. The wise grieve neither for the living nor for the dead.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण अर्जुन की बातों में विरोधाभास बताते हैं – वे प्रज्ञा की बातें तो करते हैं, परन्तु शोक उन विषयों के लिए कर रहे हैं जो शोक के योग्य नहीं हैं। आत्मा की अमरता को समझने वाला न तो जीवित के लिए शोक करता है, न मृत के लिए।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।