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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 18

अध्याय 2 · श्लोक 18

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ||१८||

antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ | anāśino 'prameyasya tasmād yudhyasva bhārata ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अन्तवन्तः: नाशवान; इमे: ये; देहाः: शरीर; नित्यस्य: नित्य; उक्ताः: कहे गए हैं; शरीरिणः: शरीरी (आत्मा) के; अनाशिनः: अविनाशी; अप्रमेयस्य: अप्रमेय (इन्द्रियों से अगम्य); तस्मात्: इसलिए; युध्यस्व: युद्ध कर; भारत: हे भारत।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इस नित्य, अविनाशी और अप्रमेय आत्मा के ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत! तू युद्ध कर।

English Translation

These bodies of the embodied Soul (which is) eternal, indestructible, and incomprehensible, are said to have an end. Therefore, fight, O Bharata.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

शरीर नाशवान हैं, आत्मा नित्य। अतः शरीरों की रक्षा की चिन्ता छोड़कर अपने कर्तव्य का पालन करो।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।