सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 18
श्लोक १८ में शरीर की नश्वरता और आत्मा की नित्यता बताई गई है, और इस आधार पर युद्ध करने का आदेश दिया गया है।
संस्कृत श्लोक
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ||१८||
antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ | anāśino 'prameyasya tasmād yudhyasva bhārata ||18||
पदच्छेद / शब्दार्थ
अन्तवन्तः: नाशवान; इमे: ये; देहाः: शरीर; नित्यस्य: नित्य; उक्ताः: कहे गए हैं; शरीरिणः: शरीरी (आत्मा) के; अनाशिनः: अविनाशी; अप्रमेयस्य: अप्रमेय (इन्द्रियों से अगम्य); तस्मात्: इसलिए; युध्यस्व: युद्ध कर; भारत: हे भारत।
हिंदी अनुवाद
इस नित्य, अविनाशी और अप्रमेय आत्मा के ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत! तू युद्ध कर।
English Translation
These bodies of the embodied Soul (which is) eternal, indestructible, and incomprehensible, are said to have an end. Therefore, fight, O Bharata.
टीका / Commentary
शरीर नाशवान हैं, आत्मा नित्य। अतः शरीरों की रक्षा की चिन्ता छोड़कर अपने कर्तव्य का पालन करो।