सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 19

श्लोक १९ में बताया गया है कि आत्मा वास्तव में न किसी को मारती है, न मरती है – यह भ्रम मात्र है।

संस्कृत श्लोक

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् | उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ||१९||

ya enaṃ vetti hantāraṃ yaś cainaṃ manyate hatam | ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate ||19||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यः: जो; एनम्: इस (आत्मा) को; वेत्ति: जानता है; हन्तारम्: मारने वाला; यः: जो; च: और; एनम्: इसको; मन्यते: मानता है; हतम्: मारा गया; उभौ: दोनों; तौ: वे; न: नहीं; विजानीतः: जानते; न: नहीं; अयम्: यह; हन्ति: मारता है; न: नहीं; हन्यते: मारा जाता है।

हिंदी अनुवाद

जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, दोनों ही नहीं जानते। यह न तो मारता है और न मारा जाता है।

English Translation

He who thinks the Self to be the slayer, and he who thinks the Self to be the slain – both do not know. It does not slay, nor is it slain.

टीका / Commentary

आत्मा अकर्ता है, वह न किसी को मारती है, न मरती है। जो ऐसा मानते हैं वे अज्ञानी हैं।