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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 19

अध्याय 2 · श्लोक 19

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् | उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ||१९||

ya enaṃ vetti hantāraṃ yaś cainaṃ manyate hatam | ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate ||19||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यः: जो; एनम्: इस (आत्मा) को; वेत्ति: जानता है; हन्तारम्: मारने वाला; यः: जो; च: और; एनम्: इसको; मन्यते: मानता है; हतम्: मारा गया; उभौ: दोनों; तौ: वे; न: नहीं; विजानीतः: जानते; न: नहीं; अयम्: यह; हन्ति: मारता है; न: नहीं; हन्यते: मारा जाता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, दोनों ही नहीं जानते। यह न तो मारता है और न मारा जाता है।

English Translation

He who thinks the Self to be the slayer, and he who thinks the Self to be the slain – both do not know. It does not slay, nor is it slain.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आत्मा अकर्ता है, वह न किसी को मारती है, न मरती है। जो ऐसा मानते हैं वे अज्ञानी हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।