सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 20

श्लोक २० में आत्मा के अजन्मा, नित्य और शाश्वत होने का वर्णन है।

संस्कृत श्लोक

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः | अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||२०||

na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ | ajo nityaḥ śāśvato 'yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre ||20||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; जायते: जन्मता; म्रियते: मरता; वा: या; कदाचित्: कभी; न: नहीं; अयम्: यह; भूत्वा: उत्पन्न होकर; भविता: होगा; वा: या; न: नहीं; भूयः: फिर; अजः: अजन्मा; नित्यः: नित्य; शाश्वतः: शाश्वत; अयम्: यह; पुराणः: पुरातन; न: नहीं; हन्यते: मारा जाता; हन्यमाने: मारे जाने पर; शरीरे: शरीर के।

हिंदी अनुवाद

यह आत्मा न कभी जन्मता है, न मरता है, न एक बार होकर फिर नहीं होने वाला है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर यह नहीं मारा जाता।

English Translation

It is never born, nor does it ever die; nor having come into existence will it again cease to be. It is unborn, eternal, everlasting, and primeval. It is not slain when the body is slain.

टीका / Commentary

यह श्लोक आत्मा की अजर-अमरता का सबसे प्रसिद्ध वर्णन है। आत्मा का न जन्म है, न मृत्यु। यह सदा रहता है।