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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 21

अध्याय 2 · श्लोक 21

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् | कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ||२१||

vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enam ajam avyayam | kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha kaṃ ghātayati hanti kam ||21||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

वेद: जानता है; अविनाशिनम्: अविनाशी; नित्यम्: नित्य; यः: जो; एनम्: इस (आत्मा) को; अजम्: अजन्मा; अव्ययम्: अव्यय; कथम्: कैसे; सः: वह; पुरुषः: पुरुष; पार्थ: हे पार्थ; कम्: किसको; घातयति: मरवाता है; हन्ति: मारता है; कम्: किसको।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! जो इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष किसको मारता है और किससे मरवाता है?

English Translation

O Partha, he who knows this Self to be indestructible, eternal, unborn, and immutable – how can that person slay anyone or cause anyone to be slain?

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आत्मा के यथार्थ ज्ञाता के लिए न मारना है, न मरना। वह सबमें एक आत्मा देखता है, इसलिए हिंसा का भाव ही नहीं रहता।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।