सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 21

श्लोक २१ में कहा गया है कि आत्मा के ज्ञाता के लिए मारना और मरना दोनों अर्थहीन हैं।

संस्कृत श्लोक

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् | कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ||२१||

vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enam ajam avyayam | kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha kaṃ ghātayati hanti kam ||21||

पदच्छेद / शब्दार्थ

वेद: जानता है; अविनाशिनम्: अविनाशी; नित्यम्: नित्य; यः: जो; एनम्: इस (आत्मा) को; अजम्: अजन्मा; अव्ययम्: अव्यय; कथम्: कैसे; सः: वह; पुरुषः: पुरुष; पार्थ: हे पार्थ; कम्: किसको; घातयति: मरवाता है; हन्ति: मारता है; कम्: किसको।

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! जो इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष किसको मारता है और किससे मरवाता है?

English Translation

O Partha, he who knows this Self to be indestructible, eternal, unborn, and immutable – how can that person slay anyone or cause anyone to be slain?

टीका / Commentary

आत्मा के यथार्थ ज्ञाता के लिए न मारना है, न मरना। वह सबमें एक आत्मा देखता है, इसलिए हिंसा का भाव ही नहीं रहता।