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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 22

अध्याय 2 · श्लोक 22

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि | तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ||२२||

vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro 'parāṇi | tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇāny anyāni saṃyāti navāni dehī ||22||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

वासांसि: वस्त्रों को; जीर्णानि: पुराने; यथा: जैसे; विहाय: त्यागकर; नवानि: नए; गृह्णाति: ग्रहण करता है; नरः: मनुष्य; अपराणि: दूसरे; तथा: वैसे ही; शरीराणि: शरीरों को; विहाय: त्यागकर; जीर्णानि: जीर्ण; अन्यानि: दूसरे; संयाति: प्राप्त होता है; नवानि: नए; देही: शरीरी (आत्मा)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।

English Translation

Just as a person casts off worn-out garments and puts on new ones, so also the embodied Self casts off worn-out bodies and enters others which are new.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह प्रसिद्ध उदाहरण है – शरीर परिवर्तन वस्त्र परिवर्तन के समान है। आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा धारण करती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।