सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 22

श्लोक २२ में आत्मा के शरीर परिवर्तन की तुलना वस्त्र बदलने से की गई है।

संस्कृत श्लोक

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि | तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ||२२||

vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro 'parāṇi | tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇāny anyāni saṃyāti navāni dehī ||22||

पदच्छेद / शब्दार्थ

वासांसि: वस्त्रों को; जीर्णानि: पुराने; यथा: जैसे; विहाय: त्यागकर; नवानि: नए; गृह्णाति: ग्रहण करता है; नरः: मनुष्य; अपराणि: दूसरे; तथा: वैसे ही; शरीराणि: शरीरों को; विहाय: त्यागकर; जीर्णानि: जीर्ण; अन्यानि: दूसरे; संयाति: प्राप्त होता है; नवानि: नए; देही: शरीरी (आत्मा)।

हिंदी अनुवाद

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।

English Translation

Just as a person casts off worn-out garments and puts on new ones, so also the embodied Self casts off worn-out bodies and enters others which are new.

टीका / Commentary

यह प्रसिद्ध उदाहरण है – शरीर परिवर्तन वस्त्र परिवर्तन के समान है। आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा धारण करती है।