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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 77

अध्याय 18 · श्लोक 77

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥७७॥

tac ca saṃsmṛtya saṃsmṛtya rūpam aty-adbhutaṃ hareḥ | vismayo me mahān rājan hṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ ||77||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तत्: that; च: and; संस्मृत्य संस्मृत्य: remembering again and again; रूपम्: form; अति-अद्भुतम्: most wonderful; हरेः: of Hari (Krishna); विस्मयः: wonder; मे: my; महान्: great; राजन्: O King; हृष्यामि: I rejoice; च: and; पुनः पुनः: again and again.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

और हरि के उस अत्यद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके, हे राजन्, मुझे बड़ा विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।

English Translation

And remembering again and again that most wonderful form of Hari, great is my wonder, O King, and I rejoice again and again.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

सञ्जय विशेष रूप से भगवान् के विश्वरूप को स्मरण करते हैं (जो अध्याय 11 में दिखाया गया था) और उससे उत्पन्न विस्मय और हर्ष को व्यक्त करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।