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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 71

अध्याय 18 · श्लोक 71

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥७१॥

śraddhāvān anasūyaś ca śṛṇuyād api yo naraḥ | so 'pi muktaḥ śubhāḻ lokān prāpnuyāt puṇya-karmaṇām ||71||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रद्धा-वान्: with faith; अनसूयः: without envy; च: and; शृणुयात्: hears; अपि: even; यः: who; नरः: a man; सः: he; अपि: also; मुक्तः: liberated; शुभान्: auspicious; लोकान्: worlds; प्राप्नुयात्: attains; पुण्य-कर्मणाम्: of the virtuous.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक और द्वेष रहित होकर इस (गीता) को सुनेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यात्माओं के शुभ लोकों को प्राप्त होगा।

English Translation

Even the man who hears this (Gita) with faith and without envy becomes liberated and attains the auspicious worlds of the virtuous.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

गीता को श्रद्धा और बिना द्वेष के सुनने मात्र से भी मनुष्य पापमुक्त होकर पुण्यलोकों को प्राप्त होता है। यह गीता के श्रवण की महिमा है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।