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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 65

अध्याय 18 · श्लोक 65

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥६५॥

man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṃ namas kuru | mām evaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo 'si me ||65||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मत्-मनाः: with mind fixed on Me; भव: become; मत्-भक्तः: My devotee; मत्-याजी: My worshipper; माम्: to Me; नमः कुरु: bow down; माम्: to Me; एव: alone; एष्यसि: you will come; सत्यम्: truly; ते: to you; प्रतिजाने: I promise; प्रियः: dear; असि: you are; मे: to Me.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझको नमस्कार कर। इस प्रकार तू मुझको ही प्राप्त होगा। मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मुझे प्रिय है।

English Translation

Fix your mind on Me, be My devotee, worship Me, and bow down to Me. Thus you will come to Me alone. I truly promise you, for you are dear to Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह गीता का सबसे महत्वपूर्ण श्लोक है, जो भक्तियोग का सार है। भगवान् स्पष्ट रूप से वचन देते हैं कि जो उनमें मन लगाता है, उनका भक्त बनता है, उनकी पूजा करता है और उन्हें नमस्कार करता है, वह उन्हें ही प्राप्त होता है। यह प्रतिज्ञा अटल है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।