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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 58

अध्याय 18 · श्लोक 58

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८॥

mac-cittaḥ sarva-durgāṇi mat-prasādāt tariṣyasi | atha cet tvam ahaṅkārān na śroṣyasi vinaṅkṣyasi ||58||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मत्-चित्तः: with mind fixed on Me; सर्व-दुर्गाणि: all obstacles; मत्-प्रसादात्: by My grace; तरिष्यसि: you will cross; अथ: but; चेत्: if; त्वम्: you; अहंकारात्: from ego; न: not; श्रोष्यसि: will listen; विनङ्क्ष्यसि: you will perish.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मुझमें चित्त लगाने वाला तू मेरी कृपा से सब दुर्गम विपत्तियों को पार कर जाएगा। परन्तु यदि तू अहंकार से नहीं सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा।

English Translation

With your mind fixed on Me, you will cross over all obstacles by My grace. But if, from ego, you do not listen, you will perish.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् स्पष्ट चेतावनी देते हैं: यदि अर्जुन उनके उपदेश को अहंकारवश नहीं मानता, तो वह नष्ट हो जाएगा। किन्तु यदि वह उनमें चित्त लगाकर उनकी शरण लेता है, तो वे उसकी रक्षा करेंगे।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।