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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 57

अध्याय 18 · श्लोक 57

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७॥

cetasā sarva-karmāṇi mayi sannyasya mat-paraḥ | buddhi-yogam upāśritya mac-cittaḥ satataṃ bhava ||57||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

चेतसा: by the mind; सर्व-कर्माणि: all actions; मयि: in Me; संन्यस्य: renouncing; मत्-परः: intent on Me; बुद्धि-योगम्: the yoga of intellect; उपाश्रित्य: resorting to; मत्-चित्तः: with mind fixed on Me; सततम्: always; भव: become.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

सम्पूर्ण कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर, निरन्तर मुझमें चित्त लगाने वाला बन।

English Translation

Mentally renouncing all actions in Me, intent on Me, resorting to the yoga of intellect, always fix your mind on Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् आदेश देते हैं: सभी कर्मों को मन से मुझे अर्पण करो, मेरे प्रति समर्पित रहो, बुद्धियोग (समबुद्धि) का सहारा लो, और सदा मुझमें चित्त लगाओ।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।