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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 54

अध्याय 18 · श्लोक 54

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४॥

brahma-bhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati | samaḥ sarveṣu bhūteṣu mad-bhaktiṃ labhate parām ||54||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ब्रह्म-भूतः: one who has become Brahman; प्रसन्न-आत्मा: with a serene self; न: not; शोचति: grieves; न: not; काङ्क्षति: desires; समः: equal; सर्वेषु: in all; भूतेषu: beings; मत्-भक्तिम्: devotion to Me; लभते: attains; पराम्: supreme.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

ब्रह्मभूत (ब्रह्मरूप) हुआ, प्रसन्नचित्त पुरुष न तो शोक करता है और न कामना करता है। सम्पूर्ण प्राणियों में समान भाव रखने वाला वह मेरी परम भक्ति को प्राप्त होता है।

English Translation

One who has become Brahman, with serene self, neither grieves nor desires; the same to all beings, he attains supreme devotion to Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जो ब्रह्म को प्राप्त हो गया, वह शोक-कामना से मुक्त, सबमें समदर्शी हो जाता है। ऐसा व्यक्ति भगवान् की परा भक्ति प्राप्त करता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।