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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 52

अध्याय 18 · श्लोक 52

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२॥

vivikta-sevī laghv-āśī yata-vāk-kāya-mānasaḥ | dhyāna-yoga-paro nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥ ||52||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

विविक्त-सेवी: dwelling in solitude; लघु-आशी: eating lightly; यत-वाक्-काय-मानसः: controlling speech, body, and mind; ध्यान-योग-परः: engaged in meditation; नित्यम्: constantly; वैराग्यम्: detachment; समुपाश्रितः: having resorted to.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

एकान्तसेवी, अल्पाहारी, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, नित्य ध्यानयोग में तत्पर, और वैराग्य का आश्रय लेकर...

English Translation

...dwelling in solitude, eating lightly, controlling speech, body, and mind, constantly engaged in meditation, and taking refuge in detachment...

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

साधना के और चरण: एकान्तवास, मिताहार, वाणी-शरीर-मन पर नियंत्रण, निरन्तर ध्यान, और वैराग्य का आश्रय।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।