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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 50

अध्याय 18 · श्लोक 50

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५०॥

siddhiṃ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me | samāsenaiva kaunteya niṣṭhā jñānasya yā parā ||50||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सिद्धिम्: perfection; प्राप्तः: having attained; यथा: as; ब्रह्म: the Supreme; तथा: so; आप्नोति: attains; निबोध: understand; मे: from Me; समासेन: in brief; एव: indeed; कौन्तेय: O son of Kunti; निष्ठा: the culmination; ज्ञानस्य: of knowledge; या: which; परा: supreme.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय! सिद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य जिस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे संक्षेप में मुझसे जान। ज्ञान की जो परा निष्ठा (परम अवस्था) है, उसे समझ।

English Translation

O son of Kunti, learn from Me in brief how one who has attained perfection attains Brahman, that supreme state of knowledge.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् अब उस परम ज्ञान का वर्णन करने जा रहे हैं, जिसके द्वारा सिद्ध पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होता है। यह ज्ञान की पराकाष्ठा है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।