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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 49

अध्याय 18 · श्लोक 49

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥४९॥

asakta-buddhiḥ sarvatra jitātmā vigata-spṛhaḥ | naiṣkarmya-siddhiṃ paramāṃ sannyāsenādhigacchati ||49||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

असक्त-बुद्धिः: whose intellect is unattached; सर्वत्र: everywhere; जित-आत्मा: who has conquered the self; विगत-स्पृहः: free from desire; नैष्कर्म्य-सिद्धिम्: the perfection of actionlessness; परमाम्: supreme; संन्यासेन: by renunciation; अधिगच्छति: attains.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जिसकी बुद्धि सर्वत्र अनासक्त है, जिसने स्वयं को जीत लिया है और जो इच्छा से रहित है – वह संन्यास के द्वारा नैष्कर्म्य (कर्मों के अभाव) रूपी परम सिद्धि को प्राप्त होता है।

English Translation

One whose intellect is unattached everywhere, who has conquered the self, and who is free from desire – attains the supreme perfection of actionlessness through renunciation.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

सच्चा संन्यासी वह है जो बुद्धि से अनासक्त, आत्मजयी और स्पृहारहित है। ऐसा व्यक्ति नैष्कर्म्य की सिद्धि पाता है, अर्थात् कर्म करते हुए भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।