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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 48

अध्याय 18 · श्लोक 48

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥४८॥

sahajaṃ karma kaunteya sa-doṣam api na tyajet | sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnir ivāvṛtāḥ ||48||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सहजम्: born with (innate); कर्म: duty; कौन्तेय: O son of Kunti; स-दोषम्: with fault; अपि: even; न: not; त्यजेत्: should abandon; सर्व-आरम्भाः: all undertakings; हि: indeed; दोषेण: by evil; धूमेन: by smoke; अग्निः: fire; इव: like; आवृताः: are covered.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय! सहज (स्वाभाविक) कर्म यदि दोषयुक्त भी हो, तो उसे नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि सम्पूर्ण आरम्भ (कर्म) दोष से उस प्रकार आवृत हैं जैसे धुएँ से अग्नि।

English Translation

O son of Kunti, one should not abandon one's innate duty, even though it is faulty; for all undertakings are enveloped by evil, as fire is covered by smoke.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कोई भी कर्म पूर्णतः दोषरहित नहीं होता, जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है। इसलिए अपने स्वाभाविक कर्म को, चाहे उसमें कुछ दोष हों, नहीं छोड़ना चाहिए। उन दोषों के बावजूद उसे करना ही श्रेयस्कर है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।