आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:३२ PM | सूर्यास्त: ०५:२८ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 47

अध्याय 18 · श्लोक 47

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥४७॥

śreyān svadharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣṭhitāt | svabhāva-niyataṃ karma kurvan nāpnoti kilbiṣam ||47||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रेयान्: better; स्वधर्मः: one's own duty; विगुणः: devoid of merit; पर-धर्मात्: than another's duty; सु-अनुष्ठितात्: well-performed; स्वभाव-नियतम्: prescribed by one's own nature; कर्म: action; कुर्वन्: performing; न: not; आप्नोति: attains; किल्बिषम्: sin.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अपना धर्म भले ही गुणहीन (त्रुटिपूर्ण) हो, पर दूसरे के धर्म से जो भलीभाँति किया गया हो, वह श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।

English Translation

Better is one's own duty, though devoid of merit, than another's duty well performed. Performing the action prescribed by one's own nature, one does not incur sin.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक गीता का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराता है। अपने स्वाभाविक धर्म का पालन करना, चाहे वह अपूर्ण हो, दूसरे के धर्म को पूर्णता से करने से बेहतर है। स्वधर्म में कोई पाप नहीं लगता।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।