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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 45

अध्याय 18 · श्लोक 45

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५॥

sve sve karmaṇy abhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ | sva-karma-nirataḥ siddhiṃ yathā vindati tac chṛṇu ||45||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

स्वे स्वे: in one's own; कर्मणि: duty; अभिरतः: engaged; संसिद्धिम्: perfection; लभते: attains; नरः: a man; स्व-कर्म-निरतः: devoted to one's own duty; सिद्धिम्: perfection; यथा: as; विन्दति: obtains; तत्: that; शृणु: hear.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अपने-अपने कर्म में तत्पर हुआ मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। स्वकर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को पाता है, उसे सुन।

English Translation

Engaged in one's own duty, a man attains perfection. Hear how one devoted to one's own duty obtains perfection.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्तव्य का पालन करते हुए मनुष्य परम सिद्धि (मोक्ष) को प्राप्त कर सकता है। अब वे उस विधि को बताएँगे।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।