मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – श्लोक 45

श्लोक ४५ में बताया गया है कि स्वकर्म में तत्पर व्यक्ति सिद्धि पाता है। Verse 45: Engaged in one's own duty, a man attains perfection.

संस्कृत श्लोक

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५॥

sve sve karmaṇy abhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ | sva-karma-nirataḥ siddhiṃ yathā vindati tac chṛṇu ||45||

पदच्छेद / शब्दार्थ

स्वे स्वे: in one's own; कर्मणि: duty; अभिरतः: engaged; संसिद्धिम्: perfection; लभते: attains; नरः: a man; स्व-कर्म-निरतः: devoted to one's own duty; सिद्धिम्: perfection; यथा: as; विन्दति: obtains; तत्: that; शृणु: hear.

हिंदी अनुवाद

अपने-अपने कर्म में तत्पर हुआ मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। स्वकर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को पाता है, उसे सुन।

English Translation

Engaged in one's own duty, a man attains perfection. Hear how one devoted to one's own duty obtains perfection.

टीका / Commentary

भगवान् कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्तव्य का पालन करते हुए मनुष्य परम सिद्धि (मोक्ष) को प्राप्त कर सकता है। अब वे उस विधि को बताएँगे।