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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 44

अध्याय 18 · श्लोक 44

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४॥

kṛṣi-gorakṣya-vāṇijyaṃ vaiśya-karma svabhāvajam | paricaryātmakaṃ karma śūdrasyāpi svabhāvajam ||44||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कृषि-गोरक्ष्य-वाणिज्यम्: agriculture, cattle-rearing, and trade; वैश्य-कर्म: the duty of a Vaishya; स्वभाव-जम्: born of his own nature; परिचर्या-आत्मकम्: consisting of service; कर्म: duty; शूद्रस्य: of a Shudra; अपि: also; स्वभाव-जम्: born of his own nature.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य – ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। तथा सेवा रूपी कर्म शूद्र के भी स्वाभाविक हैं।

English Translation

Agriculture, cattle-rearing, and trade are the natural duties of a Vaishya. And the duty consisting of service is the natural duty of a Shudra.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

वैश्य का स्वाभाविक कर्म: कृषि, पशुपालन, व्यापार। शूद्र का स्वाभाविक कर्म: सेवा। ये सभी वर्णों के कर्तव्य उनके स्वभाव के अनुकूल हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।