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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 40

अध्याय 18 · श्लोक 40

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४०॥

na tad asti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ | sattvaṃ prakṛtijair muktaṃ yad ebhiḥ syāt tribhir guṇaiḥ ||40||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: not; तत्: that; अस्ति: exists; पृथिव्याम्: on earth; वा: or; दिवि: in heaven; देवेषु: among the gods; वा: or; पुनः: again; सत्त्वम्: being; प्रकृतिजैः: born of Prakriti; मुक्तम्: free; यत्: which; एभिः: from these; स्यात्: could be; त्रिभिः: three; गुणैः: gunas.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

पृथ्वी में अथवा स्वर्ग में, देवताओं में भी, ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।

English Translation

There is no being on earth or in heaven among the gods that is free from these three gunas born of Prakriti.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् स्पष्ट करते हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि में – चाहे मनुष्य हो, देवता हों, या अन्य योनियाँ – सभी तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के अधीन हैं। कोई भी जीव इनसे पूर्णतया मुक्त नहीं है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।