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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 38

अध्याय 18 · श्लोक 38

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥३८॥

viṣayendriya-saṃyogād yat tad agre 'mṛtopamam | pariṇāme viṣam iva tat sukhaṃ rājasaṃ smṛtam ||38||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

विषय-इन्द्रिय-संयोगात्: from the contact of senses with their objects; यत् तत्: that which; अग्रे: in the beginning; अमृत-उपमम्: like nectar; परिणामे: at the end; विषम् इव: like poison; तत्: that; सुखम्: happiness; राजसम्: rajasic; स्मृतम्: is considered.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, जो प्रारम्भ में अमृत के समान (सुखद) और परिणाम में विष के समान (दुःखद) है – वह सुख राजस कहा गया है।

English Translation

That happiness which arises from the contact of the senses with their objects, which is like nectar at first but like poison at the end – that is declared to be rajasic.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

राजस सुख इन्द्रियों के भोग से मिलता है, शुरू में अत्यधिक सुखद लगता है, पर अन्त में दुःख का कारण बनता है। यह क्षणिक और बन्धनकारी है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।