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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 37

अध्याय 18 · श्लोक 37

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥३७॥

yat tad agre viṣam iva pariṇāme 'mṛtopamam | tat sukhaṃ sāttvikaṃ proktam ātma-buddhi-prasādajam ||37||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यत् तत्: that which; अग्रे: in the beginning; विषम् इव: like poison; परिणामे: at the end; अमृत-उपमम्: like nectar; तत्: that; सुखम्: happiness; सात्त्विकम्: sattvic; प्रोक्तम्: is declared; आत्म-बुद्धि-प्रसाद-जम्: born from one's own intellect and self-realization.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो सुख प्रारम्भ में विष के समान (कष्टदायक) और परिणाम में अमृत के समान (सुखद) है, तथा आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है – वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

English Translation

That which is like poison at first but like nectar at the end, born from the clarity of one's intellect and self-realization – that happiness is declared to be sattvic.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

सात्त्विक सुख प्रारम्भ में कठिन लगता है (जैसे ध्यान या व्रत), पर अन्त में वह आनन्ददायी होता है। यह आत्मचिन्तन और शुद्ध बुद्धि से उत्पन्न होता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।