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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 36

अध्याय 18 · श्लोक 36

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६॥

sukhaṃ tv idānīṃ tri-vidhaṃ śṛṇu me bharatarṣabha | abhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati ||36||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सुखम्: happiness; तु: indeed; इदानीम्: now; त्रि-विधम्: threefold; शृणु: hear; मे: from Me; भरत-ऋषभ: O best of the Bharatas; अभ्यासात्: by practice; रमते: one enjoys; यत्र: where; दुःख-अन्तम्: end of sorrow; च: and; निगच्छति: attains.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे भरतश्रेष्ठ! अब तू मुझसे तीन प्रकार के सुख को सुन। जिस सुख का अभ्यास करने से मनुष्य रमण करता है और दुःख के अन्त को प्राप्त होता है।

English Translation

O best of the Bharatas, now hear from Me about the threefold happiness. That in which one rejoices by practice and attains the end of sorrow.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् अब सुख के तीन प्रकार बताने जा रहे हैं। पहले सात्त्विक सुख का परिचय देते हुए कहते हैं कि उसके अभ्यास से सुख की प्राप्ति और दुःख का अन्त होता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।