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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 34

अध्याय 18 · श्लोक 34

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४॥

yayā tu dharma-kāmārthān dhṛtyā dhārayate 'rjuna | prasaṅgena phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī ||34||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यया: by which; तु: but; धर्म-काम-अर्थान्: dharma, pleasure, and wealth; धृत्या: by firmness; धारयते: holds; अर्जुन: O Arjuna; प्रसङ्गेन: with attachment; फल-आकाङ्क्षी: desirous of fruits; धृतिः: firmness; सा: that; पार्थ: O Partha; राजसी: rajasic.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे अर्जुन! किन्तु जिस धृति से मनुष्य आसक्तिपूर्वक फल की इच्छा रखते हुए धर्म, काम और अर्थ का आश्रय लेता है – वह धृति राजसी है।

English Translation

O Arjuna, that firmness by which, with attachment and desire for fruits, one holds fast to dharma, pleasure, and wealth – that firmness, O Partha, is rajasic.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

राजस धृति में फल की आसक्ति और इच्छा होती है। व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम को पाने के लिए दृढ़ तो रहता है, पर उसमें आसक्ति और फलेच्छा होने के कारण वह राजस कहलाती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।