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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 31

अध्याय 18 · श्लोक 31

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१॥

yayā dharmam adharmaṃ ca kāryaṃ cākāryam eva ca | ayathāvat prajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī ||31||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यया: by which; धर्मम्: righteousness; अधर्मम्: unrighteousness; च: and; कार्यम्: what ought to be done; च: and; अकार्यम्: what ought not to be done; एव: indeed; च: and; अयथावत्: not as they are; प्रजानाति: knows; बुद्धिः: intellect; सा: that; पार्थ: O Partha; राजसी: rajasic.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! जो बुद्धि धर्म और अधर्म को तथा कार्य और अकार्य को यथार्थ रूप से नहीं जानती (विपरीत या अधूरा जानती है) – वह बुद्धि राजसी है।

English Translation

O Partha, that intellect which knows righteousness and unrighteousness, and what ought to be done and what ought not, but imperfectly (not as they truly are) – that intellect is rajasic.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

राजस बुद्धि में विवेक तो होता है, पर वह पूर्ण या यथार्थ नहीं होता। वह धर्म-अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य को कभी सही, कभी गलत समझती है, या उसमें संशय रहता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।